कहानियाँ जो आवाज़ के सहारे चलीं, काग़ज़ के नहीं
लोककथाएँ कभी चुपचाप पढ़ने के लिए नहीं बनीं। वे शाम ढले सुनाई जाती थीं — आँगन में, छत पर, किसी ऐसे इंसान की ज़बानी जिसे ठीक पता था कि कहाँ रुकना है। दादी एक पल को खींच देतीं ताकि बच्चे और पास सरक आएँ। सूखे साल में किसान अंत थोड़ा नरम कर देता। हर बार कहानी ज़रा-सी बदल जाती, और यही लचीलापन उसे सदियों ज़िंदा रखे रहा।
जब ये कहानियाँ आख़िरकार छपीं, तो उन्हें स्थायित्व मिला पर साँस छूट गई। एक लोककथा पढ़ने में चार मिनट लगते हैं। उसी को अच्छे से सुनने में ज़्यादा वक़्त लगता है, और वह देर तक साथ रहती है। यहाँ हमने वही सुनने वाला रूप बचाने की कोशिश की है।






















