बीता हुआ वक़्त, बोलता हुआ
पन्ने पर पढ़ा गया इतिहास अक्सर तारीख़ों में सिमट जाता है। सुनाया गया इतिहास वह लौटा लाता है जो किताब हटा देती है — कि उसमें शामिल लोगों को नहीं पता था कि अंत क्या होगा, और वे भी सबकी तरह अँधेरे में फ़ैसले ले रहे थे।
सुनाने वाला अपनी आवाज़ में अनिश्चय टिका सकता है, छपा हुआ वाक्य नहीं टिका पाता। इन कहानियों को पढ़ने के बजाय सुनने लायक़ बनाने की सबसे बड़ी वजह यही है।






