श्री राम नवमी की कथा by Storiyaa Editorial | Storiyaa
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श्री राम नवमी की कथा
महाराज दशरथ के असीम दुख से लेकर 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' की पवित्र ज्वालाओं तक—सुनिए मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जन्म की प्रामाणिक और अत्यंत रोमांचक कथ...
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by Storiyaa Editorial
▶Story Transcript
प्राचीन काल की बात है सरयू नदी के तट पर बसी अयोध्या की महान, नगरी संपत्ति, वैभव और शांति की वहां कोई कमी नहीं थी। अयोध्या की प्रजा अत्यंत सुखी थी, परंतु उसे राज्य महल में महाराज दशरथ के चेहरे पर एक गहरा और कभी ना खत्म होने वाला दुख था। इतना विशाल राज्य अपार संपत्ति शूरवीर सी, लेकिन यह सब व्यर्थ है। मेरे बाद सूर्यवंश का इस रघुकुल का उत्तर अधिकारी कौन होगा। मेरी इस प्रजा और धर्म की रक्षा कौन करेगा नहीं। संतान होने का यह दुख मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रहा है। राजा के इस असीम दुख को देखकर कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें पुत्र का मिष्टी यज्ञ करने का सुझाव दिया। महर्षि विशिंग की अध्यक्षता में अयोध्या में एक महान यज्ञ शुरू हुआ। मित्रों की ध्वनि से पूरा आकाश गूंज उठा। यज्ञ की अंतिम आहुति के। हैं एक अद्भुत चमत्कार हुआ। यज्ञ की प्रज्वलित ज्वालामों के बीच से साक्षात् अग्नि देव एक स्वर्ण पत्र लेकर प्रकट हुई है। राजेंद्र दशरथ यह दिव्या पाया। यह दिव्या खीर अपनी तीनों रानियां को ग्रहण करने के लिए दो तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। इस पृथ्वी पर बढ़ते अन्याय और अहंकार को नष्ट करने के लिए साक्षात पर ब्रह्म शीघ्र ही तुम्हारे कुल में जन्म लेने वाले हैं। अग्नि देव की आज्ञा के अनुसार रानियां ने वो दिव्या प्रसाद ग्रहण किया। राइट बदली और वह अत्यंत शुभ और मंगलमय दिन आ गया। चैत्र शुक्ल नवमी दोपहर के 12 बजे का समय सूर्य ठीक सर के ऊपर था। पांच ग्रह अपने उच्च स्थान पर विराजमान थे। कर्क लग्न और पुनर्वसु नक्षत्र के अत्यंत शुभ योग में माता कौशल्या के गर्भ से साक्षात श्री विष्णु के सातवें अवतार ने जन्म लिया। श्री राम श्री राम नवमी का। यह पवित्र दिन केवल एक राजा का जन्मदिन नहीं है। यह दिन है असत्य पर सत्य की जीत की शुरुआत का मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने संपूर्ण विश्व को धर्म सत्य और कर्तव्य का पालन करते हुए एक आदर्श जीवन कैसे जिया जाए। यह अपने आचरण से सिखाया इसीलिए हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी रामनवमी का यह दिन आज भी अत्यंत भक्ति और उत्साह के साथ पूरे विश्व में मनाया जाता है। जय श्री राम!