शबरी और श्रीराम की भेंट
Culture

शबरी और श्रीराम की भेंट

2 PLAYS
0.0
by Storiyaa Editorial
Hindi Devotional Tales (hi)

Episode 5 of a series

Hindi Devotional Tales (hi)

Story Transcript

शबरी और श्री राम की भेंट वन की गहराइयों में जहां ऊंचे ऊंचे वृक्ष मौन साधे खड़े थे, जहां पक्षियों की चहचहाट भी प्रार्थना जैसी लगती थी। वहीं एक छोटी सी कुटिया थी। उसे कुटिया में रहती थी। सबरी सबरी कोई राजकुमारी नहीं थी। ना उनके पास धन था, न विद्या उनके पास था तो बस अटूट भक्ति और अनंत प्रतीक्षा गुरु मतंग ऋषि ने उनसे कहा था। एक दिन स्वयं नारायण इस वैन में आएंगे। तुम उनकी प्रतीक्षा करना और शबरी ने वही किया। दिन बीते वर्ष बीते जीवन बिताने लगा पर उनकी प्रतिष्ठा कभी काम नहीं हुई। हर सुबह वन से फल लाती। हर फल को चक्की जो मीठा होता उसे अलग रखती जो खट्टा होता उसे त्याग देता लोग कहते यह अनुच्छेद है। देवता को चेक हुए फल कैसे अर्पित किए जाएं पर सबरी कहती, मैं उन्हें फल नहीं अपना हृदय अर्पित करती हूं। एक दिन वन का मन टूट धनुष धारण किए दो दिव्य पुरुष कुटिया की ओर बढ़े एक के मुख पर करुणा थी। दूसरे की आंखों में अग्नि वे थे। श्री राम और लक्ष्मण शबरी ने जैसे ही उन्हें देखा, उनकी आंखों से अश्रु बहने लगे। कांपते हाथों से भी भूमि पर गिर पड़ी। प्रभु आज मेरी प्रतीक्षा पूर्ण हुई। श्री राम ने उन्हें उठाया और कहा मां तुम्हारी भक्ति नहीं। हमें यहां खींच लाया है। उन्होंने प्रेम से चुना था। थोड़े संकोच के साथ बोली प्रभु मैं इन फलों को चखा है। यदि यह अपराध हो तो मुझे क्षमा करें। श्री राम मुस्कुराए उन्होंने एक फल लिया और खा लिया फिर। दूसरा फिर तीसरा और बोले मन आज तक मैं इतना मीठा फल नहीं खाया क्योंकि ये फल प्रेम से भरा है। भक्ति से पका है। लक्ष्मण आश्चर्य से देखते रह गए। उसे क्षण शबरी का शरीर शांत हो गया। उनका जीवन उद्देश्य पूर्ण कर चुका था। उनका हृदय श्री राम में विलीन हो गया। श्री राम ने कहा, जो प्रेम से देता है, वही सच्चा भक्त है। भक्ति में नियम नहीं भाव प्रधान होता है और वन फिर से मौन हो गया पर उसे मौन में आज भी शबरी की भक्ति की गूंज सुनाई देती है।

Reviews

0.0

Rate this story

Loading reviews...