▶Story Transcript
बहुत समय पहले की बात है, मगध राज्य में चित्रसेन नामक राजा राज करते थे। राजा चित्रसेन अपनी हँसी और खुशमिजाजी के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध थे। उनके दरबार में हँसी-मजाक, शेरो-शायरी और हास्य की फुलझड़ियाँ हर दिन बिखरती थीं। पर एक दिन, कुछ ऐसा हुआ कि सारी खुशियाँ स्याह बादलों में छुप गईं।
उस दिन, राजा के पुराने मित्र का दुखद समाचार आया। राजा चित्रसेन को गहरा आघात पहुँचा। वह न रो सके, न हँस सके। धीरे-धीरे उनकी मुस्कान गायब हो गई और उनके चेहरे पर गहरी उदासी छा गई। दरबार का वातावरण भी बदल गया। मंत्री, सैनिक, दरबारी—सब जैसे सन्नाटे में चले गए।
राजवैद्य ने तरह-तरह की जड़ी-बूटियाँ दीं, हास्य-कवि ने गीत सुनाए, विदूषक ने तमाशे किए, पर राजा की हँसी कहीं खो गई थी। राजा ने भारी मन से ऐलान करवाया—जो भी उनकी हँसी वापस लौटाएगा, उसे सोने की सौ मुद्राएँ मिलेंगी और दरबार में विशेष सम्मान दिया जाएगा।
अब दरबार में चर्चा होने लगी—“कौन कर सकता है यह असम्भव काम?” सबसे चतुर दरबारी, हरिप्रसाद, ने सोचा, “राजा को हँसाना आसान नहीं रह गया, पर अगर उनका ध्यान उनकी उदासी से हटे, तो शायद...।”
हरिप्रसाद अगले दिन दरबार में उपस्थित हुआ। उसने राजा से कहा, “महाराज, क्या मुझे आपसे कुछ प्रश्न पूछने की अनुमति है?”
राजा ने सुस्त स्वर में कहा, “पूछो, हरिप्रसाद।”
हरिप्रसाद बोला, “महाराज, आपके राज्य में सबसे बड़ा कौन है?”
राजा ने कहा, “मैं।”
हरिप्रसाद ने अगला सवाल किया, “सबसे छोटा कौन है?”
राजा ने थके स्वर में उत्तर दिया, “यह सवाल तुच्छ है, पर शायद कोई कीड़ा-पतंगा।”
“बहुत ठीक, महाराज,” हरिप्रसाद बोला, “अब बताइए, सबसे तेज़ कौन है?”
राजा ने कहा, “समय।”
अब हरिप्रसाद ने मुस्कराते हुए पूछा, “महाराज, सबसे भारी चीज़ कौन सी है?”
राजा कुछ सोचने लगे, फिर बोले, “पर्वत।”
हरिप्रसाद ने सिर हिलाया, “नहीं महाराज, सबसे भारी है आपकी उदासी, जो पूरे दरबार पर छाई हुई है।”
दरबार में चुप्पी छा गई। राजा ने पहली बार ध्यान से हरिप्रसाद को देखा।
हरिप्रसाद आगे बोला, “महाराज, हम सब आपकी मुस्कान के लिए तरस रहे हैं। आपकी उदासी देख राज्य का हर आदमी खुद को अकेला महसूस करता है। क्या आप जानते हैं, आपके उदास होने से राज्य की गायों ने दूध देना कम कर दिया है?”
राजा ने हैरानी से पूछा, “ऐसा कैसे?”
हरिप्रसाद ने कहा, “क्योंकि वे सोचती हैं, अगर राजा खुश नहीं, तो दूध किसे पिलाएँ?”
दरबार में कई लोग दबे हँसी हँस पड़े। राजा के चेहरे पर हल्की मुस्कान छलक आई।
हरिप्रसाद ने यह देख राजा से अनुरोध किया, “महाराज, अगर आप एक बार मुस्कुराएँ, तो राज्य के सभी फूल फिर खिल उठेंगे। बच्चों की किलकारियाँ गूँजेंगी। और यदि आपकी हँसी लौट आए, तो मैं अपने सिर के सारे बाल मुंडवा लूँगा और पूरे बाजार में नाचूँगा!”
राजा ने पहली बार ठहाका लगाया। “हरिप्रसाद, तुम तो बड़े मज़ाकिया हो। ऐसा कर दिया, तो राज्य में हँसी की बाढ़ आ जाएगी!”
हरिप्रसाद ने सिर झुकाकर कहा, “महाराज, आपकी हँसी ही इस राज्य की असली दौलत है। वैद्य हार गए, कवि हार गए, पर एक सच्ची बात और हल्का-फुल्का मजाक भी कभी-कभी बड़ा चमत्कार कर देता है।”
राजा चित्रसेन ने हरिप्रसाद को गले लगा लिया। उन्होंने घोषणा की, “मेरे राज्य का सबसे चतुर इंसान वही है, जो समय पर हास्य का तीर चला सके। हरिप्रसाद को सौ स्वर्ण मुद्राएँ दी जाएँ।”
उस दिन के बाद, राजा की हँसी वापस आ गई। दरबार में फिर से रौनक छा गई। हरिप्रसाद के किस्से राज्य भर में मश