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बहुत समय पहले की बात है। उज्जैनी नगर के राजा चंद्रभान बड़े न्यायप्रिय और परिश्रमी शासक थे। उनकी प्रजा सुखी थी, राज्य समृद्धि से भरपूर था, किंतु खुद राजा दिनोंदिन उदास रहने लगे थे। उनके मन पर कोई भारी बोझ था, जिससे वे न तो चैन से सो पाते, न ही किसी से हँसी-मजाक करते।
राजमहल के वैद्यों और विद्वानों ने अनेक जड़ी-बूटियाँ, औषधियाँ, और अनुष्ठान किए, पर राजा की उदासी दूर नहीं हुई। मंत्रीगण भी चिंता में पड़ गए।
एक दिन राज्य के प्रसिद्ध वैद्य वागीश को दरबार में बुलवाया गया। वागीश बुद्धिमान और हँसमुख व्यक्ति थे। वे राजा के पास पहुँचे और नम्रता से बोले, “महाराज, मुझे आपके रोग का कारण जानना होगा। कृपया बताइए, आप कब से दुखी हैं?”
राजा ने ठंडी साँस ली और बोले, “मैं स्वयं नहीं जानता, वैद्यजी। मेरे पास सबकुछ है, किंतु न जाने क्यों, हृदय की खुशी चली गई है। कोई बात हँसा नहीं सकती, कोई दृश्य आनंद नहीं देता।”
वागीश मुस्कराए, “महाराज, क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि चिंता और उदासी, मन की बीमारी हैं, जिसका इलाज औषधियों से नहीं, हँसी और ज्ञान से होता है?”
राजा ने पहली बार ध्यान से वैद्य को देखा। वागीश बोले, “महाराज, मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ। अगर आप चाहें, तो मेरे साथ कुछ पल बिताएँ और मेरी बातें सुनें।”
राजा ने सहमति में सिर हिलाया। वागीश ने कहना शुरू किया—
“एक बार एक आदमी अपने गाँव में सबसे बुद्धिमान कहलाता था। वह सोचता था कि वह सब जानता है। एक दिन वह जंगल में गया और एक गहरे कुएँ में गिर गया। वह चिल्लाने लगा, ‘कोई मुझे बचाओ!’
थोड़ी देर बाद, एक बूढ़ी अम्मा वहाँ आई। उसने कुएँ में झाँका और बोली, ‘बेटा, बाहर कैसे आओगे?’
आदमी बोला, ‘मुझे ऊपर खींच लो।’
अम्मा बोली, ‘अरे बेटा, अगर मैं इतनी ताकतवर होती तो मैं खुद कुएँ में कूद जाती, मुझे भी कोई खींच लेता।’
आदमी हँस पड़ा। तभी उसने देखा कि कुएँ में कुछ पत्थर निकले हुए हैं। वह उनकी मदद से धीरे-धीरे ऊपर चढ़ आया।
अब वह समझ गया कि कभी-कभी समस्या से बाहर निकलने का रास्ता खुद हमारे भीतर छुपा होता है, बस उसके लिए हँसना और सोच बदलना जरूरी होता है।”
राजा कहानी सुनते-सुनते मुस्कराने लगे।
वागीश ने कहा, “महाराज, गंभीरता और चिंता में डूबकर भी जीवन के असली रंग नहीं देखे जा सकते। जब हम जीवन का हल्कापन समझते हैं, तब भीतर की खुशी जागती है।”
राजा ने पहली बार खुलकर हँसी के स्वर में कहा, “तो क्या मेरी बीमारी का इलाज सिर्फ हँसी है?”
वागीश मुस्कराए, “हँसी और ज्ञान, दोनों। एक और छोटी कहानी सुनिए, महाराज।
एक नगर में एक मूर्ख राजा था, जो हर समय उदास रहता था। उसके मंत्री ने उसे एक साधु के पास भेजा। साधु ने राजा को अपने जूते दिए और कहा, ‘इन जूतों को पहनकर नगर में घूमो और हर उस व्यक्ति को खोजो, जो कभी दुखी न हुआ हो।’
राजा दिनभर नगर में घूमता रहा, पर कोई ऐसा न मिला। सबकी अपनी-अपनी परेशानियाँ थीं।
शाम को राजा साधु के पास लौटा और बोला, ‘महाराज, हर कोई कभी न कभी दुखी होता है।’
साधु ने हँसकर कहा, ‘अब तो समझ गए? जीवन में दुख भी है, सुख भी। यदि हम हर समय सुख की ही आशा करेंगे, तो दुख हमेशा बड़ा लगेगा। हँसी, जीवन के दुख-सुख को हल्का बना देती है।’”
राजा अब जोर से हँस पड़े। उन्होंने पहली बार महसूस किया कि दुख को बांट कर, और हँसी से उसका बोझ हल्का किया जा सकता है।
उस दिन के बाद से राजा चंद्रभान ने रोज़ नई बातें सीखना और लोगों से हँसी-मजाक करना शुरू कर दिया।
राज्य में फिर से रौनक लौट आई, और राजा के चहरे पर मुस्कान छा गई।
राजा ने आखिर में वागीश से पूछा, “वैद्यजी, आपने मुझे दवा नहीं