▶Story Transcript
एक बार की बात है, अकबर बादशाह अपने बेमिसाल दरबारियों के साथ बाग में टहल रहे थे। ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में चाँद चमक रहा था। उसी वक्त, एक गरीब किसान अपने फटे-पुराने कपड़ों में काँपता हुआ दरबार के सामने पहुँचा।
किसान ने हाथ जोड़कर अकबर से अर्ज़ की, "हुज़ूर, मेरी बेटी की शादी है, लेकिन मेरे पास दहेज के लिए पैसे नहीं हैं। कृपा करके मेरी मदद कीजिए।"
अकबर के मन में एक शरारती विचार आया। कुछ सोचकर वे बोले, "अगर तुम इस महल के पास वाले ठंडे तालाब में पूरी रात बिना आग या कपड़े के बिताओगे, तो मैं तुम्हें इनाम दूँगा।"
किसान ने कांपती आवाज़ में पूछा, "ठंड में...पूरी रात?"
अकबर ने मुस्कराकर सिर हिलाया, "अगर हिम्मत है, तो कर दिखाओ।"
किसान मजबूरी में मान गया। रात हुई, उसने अपने कपड़े उतारे और तालाब में उतर गया। तेज़ सर्दी थी, पानी बर्फ जैसा ठंडा। दूर खड़े पहरेदार उसकी निगरानी करते रहे।
रात के वक्त किसान की हड्डियाँ कंपकपा रही थीं, लेकिन उसने अपनी बेटी की मुस्कराती हुई सूरत आँखों में बसा ली थी। किसी तरह सुबह हो गई। पहरेदारों ने देखा, किसान जीवित है।
सुबह किसान काँपता-काँपता दरबार में हाजिर हुआ। वह थका हुआ था, पर उसकी आँखों में उम्मीद थी।
अकबर ने पूछा, "क्या तुमने पूरी रात तालाब में बिताई?"
किसान ने सिर झुकाकर जवाब दिया, "जी, महाराज।"
अकबर ने पहरेदारों से तसल्ली की और बोले, "ठीक है। पर क्या तुम्हें बाहर कहीं से गर्मी मिली थी?"
किसान ने डरते-डरते बताया, "जी महाराज, बहुत दूर महल की छत पर एक दीया जल रहा था। कभी-कभी उसकी हल्की सी रौशनी दिख जाती थी।"
अकबर ने मुस्कराकर कहा, "तो तुमने ठंड से बचने के लिए उस दीये की आँच ली। इनाम नहीं मिलेगा!"
किसान की आँखों में आँसू आ गए। वह भारी मन से लौट गया।
दरबार में बीरबल भी बैठे थे। उन्हें किसान की हालत देखकर बहुत बुरा लगा। अगले दिन बगैर कुछ कहे बीरबल ने अपने बगीचे में एक बड़ा सा हांडी लटकाया और उसमें चावल डालकर खिचड़ी पकाने लगे।
अकबर ने खिड़की से देखा और हैरान होकर बगीचे की ओर चल पड़े। बीरबल एक छोटी-सी लौ जलाकर हांडी के कई फीट नीचे रखे बैठे थे।
अकबर ने पूछा, "बीरबल, इतनी दूर से यह खिचड़ी कैसे पकेगी?"
बीरबल मुस्कराए, "बिल्कुल वैसे ही, जैसे किसान तालाब में दूर के दीये से गरम हुआ होगा।"
अकबर चौंक गए, "लेकिन यह तो नामुमकिन है।"
बीरबल ने सिर झुकाकर कहा, "तो फिर किसान ने भी तालाब में दूर के दीये की रौशनी से कैसे गर्मी पाई?"
कुछ पल तक अकबर चुप रहे। फिर उनका चेहरा गंभीर हो गया।
उन्होंने दरबार बुलाया और किसान को भी बुलवाया।
अकबर बोले, "आज मुझे अपनी गलती माननी होगी। किसान ने ईमानदारी से पूरी रात तालाब में बिताई थी। उसे उसका इनाम मिलना चाहिए।"
किसान की आँखों में चमक आ गई। अकबर ने उसे इनाम में सोने की मुहरें दीं।
सारा दरबार बीरबल की बुद्धिमानी की तारीफ करने लगा।
अकबर ने मुस्कराकर बीरबल से कहा, "तुमने मुझे न्याय का असली मतलब समझा दिया।"
बीरबल सिर झुकाकर बोला, "जहाँ न्याय की खुशबू है, वहाँ ही दरबार की शोभा है।"
किसान ने भीगी आँखों से अकबर और बीरबल को धन्यवाद दिया और बोला, "आपके दरबार में आज सचमुच न्याय हुआ है।"
उस दिन से अकबर ने यह ठान लिया कि वे कभी भी किसी की मेहनत और ईमानदारी पर शक नहीं करेंगे।
यही है बीरबल की खिचड़ी का स्वाद, जिसमें न्याय और समझदारी घुली रहती है।