▶कहानी ट्रांसक्रिप्ट
बहुत समय पहले, एक घना जंगल था, जिसमें तरह-तरह के जीव जंतु रहते थे। उसी जंगल में चूहों का एक बड़ा दल रहता था, जिसकी अगुआई बुद्धिमान चूहा मनमोहन करता था। चूहे हमेशा समूह में रहते और अपनी छोटी-छोटी दुनिया में बेहद खुश थे।
एक बार, पड़ोसी पहाड़ों में भीषण सूखा पड़ा। वहाँ के हाथी प्यास से बेहाल हो गए। उनके राजा, गजराज ने अपने झुंड को आदेश दिया, "हमें पानी की तलाश करनी होगी, वरना हम सब मारे जाएंगे।"
गजराज के नेतृत्व में सैकड़ों हाथी जंगल में घूम-घूमकर पानी खोजने लगे। अंत में, उन्हें एक बड़ा जलाशय नजर आया, जो ठीक उसी बस्ती के पास था जहाँ चूहे रहते थे।
हाथियों के विशाल पैरों और भारी शरीर के चलते चूहों की बहुत सारी बिल्लियाँ और बिलों का नामोनिशान मिट गया। कई चूहे घायल हो गए, कुछ मारे भी गए।
मनमोहन ने अपनी टोली को इकट्ठा किया और कहा, "हाथी बहुत बड़े हैं, लेकिन हमें शांत रहकर हल ढूँढना होगा। मैं खुद उनके राजा से बात करूंगा।"
मनमोहन साहस कर गजराज के पास पहुँचा और बोला, "महाराज, हम छोटे-से प्राणी हैं, लेकिन हमारी भी एक बस्ती है। आपके झुंड के कारण हमारे घर और साथी नष्ट हो रहे हैं। कृपा करके, अगर आप अपने झुंड को किसी और रास्ते से ले जाएँ तो हम आपके आजीवन ऋणी रहेंगे।"
हाथी राजा गजराज ने देखा कि चूहे सचमुच मुसीबत में हैं। उसका हृदय पिघल गया। उसने विनम्रता से कहा, "छोटे मित्र, तुम्हारा दुःख सुनकर मुझे दुख हुआ। मैं अपने साथियों से कहूँगा कि वे आगे से तुम्हारे घरों को नुकसान न पहुँचाएँ।"
इसके बाद, हाथियों ने अपनी दिशा बदली और चूहों की बस्ती को छोड़कर जलाशय जाने लगे। चूहे बहुत खुश हुए और मन ही मन सोचा कि इतना बड़ा उपकार कभी नहीं भूलेंगे।
समय बीतता गया। एक दिन, राजा गजराज और उसके झुंड को जंगल के शिकारी ने पकड़ने के लिए बड़ा जाल बिछा रखा था। जैसे ही झुंड उधर से गुजरा, सबके पैर जाल में उलझ गए। हाथी उठा-पटक करने लगे, लेकिन जाल बहुत मजबूत था।
हाथियों ने मदद के लिए पुकारा, पर जंगल में उनकी आवाज कहीं गुम हो गई। गजराज ने सोचा, "कितना अच्छा होता अगर कोई हमारी मदद कर पाता।"
तभी, एक पक्षी ने चूहों को आकर खबर दी, "तुम्हारे मित्र गजराज और उसका झुंड शिकारी के जाल में फँस गए हैं।" मनमोहन ने बिना देर किए अपने पूरे दल को साथ लिया और जंगल की उस दिशा में दौड़ा।
मनमोहन चिल्लाया, "मित्रों, हम छोटे हैं लेकिन हमारी दाँतें तेज हैं। हर कोई अपनी पूरी ताकत लगाकर जाल काटे।"
सैकड़ों चूहे फुर्ती से हाथियों के पैरों तक पहुँचे और अपने दाँतों से जाल के तागों को काटने लगे। थोड़ी ही देर में जाल टूट गया। हाथी एक-एक कर आज़ाद हो गए।
गजराज ने खुशी से मनमोहन को धन्यवाद कहा, "दोस्त, आज पता चला कि सच्चा मित्र वही है जो मुसीबत में काम आए, चाहे वो जितना भी छोटा क्यों न हो।"
मनमोहन मुस्कराया, "महाराज, आपने हमारे घर बचाए थे। आज हमने अपना कर्तव्य निभाया।"
इसके बाद, हाथियों ने जब भी चूहों की बस्ती के पास से गुज़रना होता, वे बहुत सावधानी से चलते। धीरे-धीरे दोनों की मित्रता पूरे जंगल में प्रसिद्द हो गई।
यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची मित्रता में न कोई बड़ा होता है, न छोटा। हर प्राणी का अपना महत्व है और मदद का ऋण कभी व्यर्थ नहीं जाता।