भगवान विष्णु की तिरुमाला आगमन कथा by Storiyaa Editorial | Storiyaa
History
भगवान विष्णु की तिरुमाला आगमन कथा
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by Storiyaa Editorial
▶Story Transcript
यह कथा कलयुग के सबसे जागृत देव भगवान वेंकटेश्वर की है। यह कहानी त्याग विरह भक्ति और उसे रन यानी कर्ज की है जिसे चुकाने के लिए स्वयं विष्णु आज भी तिरुमला की पहाड़ियों में निवास करते हैं। श्री वेंकटेश्वर महात्मे जब बैकुंठ छोड़कर धरती पर आए भगवान विष्णु तिरुमला की सात पहाड़ियों जिन्हें सप्तगिरि कहा जाता है। वे शेषनाग के साथ फलों का प्रतीक मानी जाती हैं। भगवान विष्णु का यहां आगमन एक ऐसी घटना से जुड़ा है जिसने देवताओं के अहंकार को नष्ट किया और प्रेम की एक नई परिभाषा लिखी भृगु ऋषि की परीक्षा और दूसरों का क्रोध कथा की शुरुआत होती है। एक विशाल यज्ञ से कलयुग के प्रारंभ में गंगा के तट पर ऋषि मुनि एक महान यज्ञ कर रहे थे। उनके मन में दुविधा थी कि इस यज्ञ का फल किस अर्पित किया जाए। ब्रह्मा विष्णु या शिव निर्णय लेने का उत्तरदायित्व भृगु ऋषि को सोपा गया। भृगु ऋषि पहले ब्रह्म लोग गए। फिर शिव लोग लेकिन उन्हें दोनों ही स्थान पर उचित सत्कार नहीं मिला। अंत में वे बैकुंठ पहुंचे। वहां भगवान विष्णु निद्रा में थे और देवी लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थी। भृगु ऋषि को लगा कि विष्णु जानबूझकर उनका अनादर कर रहे हैं। क्रोध में जाकर भगवान विष्णु ने बक्श स्थल यानी छाती पर प्रहार किया। विष्णु जी ने क्रोधित होने के बजाय ऋषि के पैर पकड़ लिए और पूछा है। ऋषि भर मेरे कठोर बक्श स्थल से आपके कोमल चरणों में चोट तो नहीं लगी। विष्णु जी की इस विनम्रता ने भृगु का अहंकार तोड़ दिया, लेकिन देवी लक्ष्मी अत्यंत क्रोधित हो गई। विष्णु जी का वक्ष स्थल देवी लक्ष्मी का निवास स्थान था और वहां प्रहार करना उनका अपमान था। इस बात से रुष्ट होकर माता लक्ष्मी ने वैकुंड त्याग दिया और धरती पर कोल्हापुर में आकर रहने लगी। विष्णु का वैराग्य और श्रीनिवास का अवतार लक्ष्मी के बिना बैकुंठ उजाड़ हो गया। भगवान विष्णु विरह में व्याकुल होकर माता लक्ष्मी को खोजने के लिए धरती पर आए उन्होंने। पास के रूप में अवतार लिया और शेष चलम की पहाड़ियों यानी तिरुमला में एक चींटी के बिल में छिपकर तपस्या करने लगे। भगवान के कष्ट को देखकर ब्रह्मा और शिव ने गाय और बछड़े का रूप धारण किया ताकि वे श्रीनिवास को दूध पिला सके। उसे समय वहां के राजा के चरवाहे ने जब देखा कि गए अपना सारा दूध एक चींटी के बिल में गिरा देती है तो उसने क्रोध में कुल्हाड़ी से वार किया। श्रीनिवास को बचाने के प्रयास में वह कुल्हाड़ी उनके मस्तक पर लगी और वे लहू लोहान हो गए। पद्मावती से विवाह और कुबेर का कर्ज़ अपनी चोट के उपचार के लिए श्रीनिवास बकुला देवी जो पूर्व जन्म में यशोदा थी, के पास पहुंचे। बगुला देवी ने उनका लालन पालन किया। कुछ समय बाद श्रीनिवास का परिचय आकाश राजा की पुत्री पद्मावती से हुआ जो साक्षात लक्ष्मी का ही अंश थी। दोनों का विवाह तय हुआ विवाह के भव्य आयोजन के लिए श्रीनिवास के पास धन नहीं था। तब उन्होंने कलयुग के अंत तक के लिए धन की देवता कुबेर से भारी मात्रा में ऋण लिया। ये तय हुआ कि कलयुग। अंत तक भगवान अपने भक्तों द्वारा चढ़ाए गए दान से इस कर्ज का केवल ब्याज चुकाएंगे। तिरुपति में स्थापना और कलियुग का वरदान जब माता लक्ष्मी को इस विवाह का पता चला तो वहां पहुंची कथा के अनुसार जब दोनों देवियों आमने-सामने आई तो श्रीनिवास ने एक पत्थर की मूर्ति का रूप धारण कर लिया। ब्रह्मा और शिव ने प्रकट होकर दोनों देवियों को शांत कराया और श्रीनिवास के अवतार का उद्देश्य समझाया। भगवान ने वचन दिया कि वे इस पर्वत पर वेंकटेश्वर के रूप में सदा के लिए विराजमान रहेंगे ताकि कलयुग से पीड़ित मानवता का कल्याण कर सकें। तिरुमला के कुछ अनसुने तथ्य स्क्रिप्ट्रल फैक्ट्स स्वयंभू मूर्ति तिरुमला में स्थापित भगवान की मूर्ति किसी ने बनाई नहीं है बल्कि वह स्वयंभू यानी स्वयं प्रकट मानी जाती है। कर्ज की परंपरा आज भी तिरुपति में जो दान दिया जाता है, उसे कुबेर के कर्ज का ब्याज माना जाता है। मानता है कि जो भक्त यहां दान देता है भगवान उसकी झोली कभी खाली नहीं रहने देते मास। पर कपूर भगवान के मस्तक पर हमेशा एक विशेष कपूर बच्चा का पुरम का लेप लगाया जाता है ताकि वह कुल्हाड़ी का घाव दिखाई ना दे बालों का रहस्य कहा जाता है कि भगवान की मूर्ति पर जो बाल है, वे असली हैं और कभी उलझते नहीं है। निष्कर्ष भगवान विष्णु का तिरुमला आना। यह दर्शाता है कि ईश्वर अपने भक्तों के लिए न केवल वैकुंड त्याग सकते हैं बल्कि उनके कल्याण के लिए कर्जदार भी बन सकते हैं। तिरुपति की ये भूमि आज भी लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है जहां गोविंदा गोविंदा के जयकारे से पूरा ब्रह्मांड गूंज उठता है।