जब एक घमंडी विद्वान राजा कृष्णदेव राय के दरबार में सबको नीचा दिखाता है, तेनालीराम अपनी बुद्धि और विनोद से उसे विनम्रता का असली अर्थ सिखाते हैं।
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by Storiyaa Editorial
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विजयनगर के प्रसिद्ध दरबार में एक दिन एक बड़ा विद्वान आया। उसका नाम था पंडित रुद्रभट्ट। उसके सिर पर बड़ा सा पगड़ी, चेहरे पर घमंड और चाल में आत्मविश्वास था। दरबार में पहुँचते ही उसने ऊँची आवाज़ में कहा, "इस राज्य में यदि कोई मुझसे अधिक ज्ञानी है, तो सामने आए!"
राजा कृष्णदेव राय को ऐसे विद्वानों से मिलना अच्छा लगता था, लेकिन रुद्रभट्ट का व्यवहार उन्हें कुछ अजीब लगा। सभी दरबारी चुप हो गए, किसी की हिम्मत नहीं थी, जो रुद्रभट्ट की चुनौती स्वीकार करे।
रुद्रभट्ट ने आगे कहा, "मैंने चारों वेद, छहों शास्त्र, अनेक भाषाएँ और सभी गणित के सूत्र कंठस्थ कर रखे हैं। क्या यहाँ कोई है, जो मेरे प्रश्नों का उत्तर दे सके?"
राजा ने मुस्कराते हुए तेनालीराम की ओर देखा, जो हमेशा अपने हास्य और बुद्धि के लिए प्रसिद्ध था। तेनालीराम ने सिर झुकाकर राजा की अनुमति ली और बोला, "पंडित जी, अगर आपके मन में कोई जिज्ञासा है, तो कृपया पूछिए।"
रुद्रभट्ट ने आँखें मटकाते हुए पहला प्रश्न पूछा, "कहिए, ऐसी कौन सी चीज़ है, जो बिना देखे भी पहचानी जाती है?"
तेनालीराम बोला, "गंध। जैसे फूल की खुशबू दूर-दूर तक अपनी पहचान बिखेर देती है, वैसे ही।"
रुद्रभट्ट को यह सुनकर थोड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन उसने दूसरा प्रश्न पूछा, "ऐसा कौन सा धन है, जो खर्च करने से बढ़ता है?"
तेनालीराम मुस्कराया, "ज्ञान। जितना बाँटो, उतना ही बढ़ता है।"
दरबार में हल्की-सी हँसी गूँज उठी। रुद्रभट्ट को लगा कि तेनालीराम उसे हल्के में ले रहा है। उसने तीसरा प्रश्न पूछा, "ऐसी कौन सी चीज़ है, जिसे जितना छुपाओ, उतनी ही प्रकट होती है?"
तेनालीराम ने तुरंत उत्तर दिया, "सच्चाई।"
अब तो दरबारियों ने भी तेनालीराम की हाजिरजवाबी की प्रशंसा की। रुद्रभट्ट का चेहरा तमतमा उठा, उसने सोचा, अब थोड़ा कठिन प्रश्न पूछता हूँ।
उसने एक जटिल संस्कृत श्लोक पढ़ा और बोला, "इसका अर्थ बताइए।"
तेनालीराम ने मुस्कराकर कहा, "पंडित जी, अर्थ तो बताऊँगा, लेकिन पहले आप यह बताइए कि इतने ज्ञान के बाद भी आपके व्यवहार में विनम्रता क्यों नहीं है?"
रुद्रभट्ट भौचक्का रह गया। उसने कहा, "मैं श्रेष्ठ हूँ, इसलिए...!"
तेनालीराम ने कहा, "ज्ञान की असली पहचान विनम्रता है। जैसे आम का पेड़ जितना फलदार होता है, उतना ही झुक जाता है।"
राजा कृष्णदेव राय ने ताली बजाई, "बहुत सुंदर तेनाली! यही तो असली विद्या है—जो जितना बड़ा होता है, उतना ही विनम्र होता है।"
रुद्रभट्ट का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने संकोच के साथ तेनालीराम से कहा, "आपने सही कहा, मुझे अपनी भूल स्वीकार है। मैं उन सभी से क्षमा चाहता हूँ, जिन्हें मैंने अपमानित किया।"
तेनालीराम ने मुस्कराकर कहा, "पंडित जी, ज्ञान का सबसे बड़ा गहना विनय है। जब तक उसमें नम्रता नहीं, वह अधूरा है।"
दरबार में सभी ने तेनालीराम की प्रशंसा की। रुद्रभट्ट ने विनम्र होकर राजा और तेनालीराम को धन्यवाद दिया और वादा किया कि आगे से वह अपने ज्ञान के साथ विनम्रता का भी पालन करेगा।
उस दिन से दरबार में एक नई कहावत प्रचलित हुई— "ज्ञान बड़ा नहीं, ज्ञान के साथ नम्रता सबसे बड़ी।"
तेनालीराम की बुद्धिमत्ता और उसकी सीख से पूरा दरबार गूंज उठा। सबने समझा कि कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो, अगर उसमें विनम्रता नहीं, तो उसका ज्ञान अधूरा है।
उस दिन के बाद विजयनगर में हर किसी ने तेनालीराम की बात गाँठ बाँध ली— "ज्ञान के साथ-साथ विनम्रता जरूरी है।"
यही थी तेनालीराम की सीख, जो आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी तब थी।
जब एक घमंडी विद्वान राजा कृष्णदेव राय के दरबार में सबको नीचा दिखाता है, तेनालीराम अपनी बुद्धि और विनोद से उसे विनम्रता का असली अर्थ सिखाते हैं।
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विजयनगर के प्रसिद्ध दरबार में एक दिन एक बड़ा विद्वान आया। उसका नाम था पंडित रुद्रभट्ट। उसके सिर पर बड़ा सा पगड़ी, चेहरे पर घमंड और चाल में आत्मविश्वास था। दरबार में पहुँचते ही उसने ऊँची आवाज़ में कहा, "इस राज्य में यदि कोई मुझसे अधिक ज्ञानी है, तो सामने आए!"
राजा कृष्णदेव राय को ऐसे विद्वानों से मिलना अच्छा लगता था, लेकिन रुद्रभट्ट का व्यवहार उन्हें कुछ अजीब लगा। सभी दरबारी चुप हो गए, किसी की हिम्मत नहीं थी, जो रुद्रभट्ट की चुनौती स्वीकार करे।
रुद्रभट्ट ने आगे कहा, "मैंने चारों वेद, छहों शास्त्र, अनेक भाषाएँ और सभी गणित के सूत्र कंठस्थ कर रखे हैं। क्या यहाँ कोई है, जो मेरे प्रश्नों का उत्तर दे सके?"
राजा ने मुस्कराते हुए तेनालीराम की ओर देखा, जो हमेशा अपने हास्य और बुद्धि के लिए प्रसिद्ध था। तेनालीराम ने सिर झुकाकर राजा की अनुमति ली और बोला, "पंडित जी, अगर आपके मन में कोई जिज्ञासा है, तो कृपया पूछिए।"
रुद्रभट्ट ने आँखें मटकाते हुए पहला प्रश्न पूछा, "कहिए, ऐसी कौन सी चीज़ है, जो बिना देखे भी पहचानी जाती है?"
तेनालीराम बोला, "गंध। जैसे फूल की खुशबू दूर-दूर तक अपनी पहचान बिखेर देती है, वैसे ही।"
रुद्रभट्ट को यह सुनकर थोड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन उसने दूसरा प्रश्न पूछा, "ऐसा कौन सा धन है, जो खर्च करने से बढ़ता है?"
तेनालीराम मुस्कराया, "ज्ञान। जितना बाँटो, उतना ही बढ़ता है।"
दरबार में हल्की-सी हँसी गूँज उठी। रुद्रभट्ट को लगा कि तेनालीराम उसे हल्के में ले रहा है। उसने तीसरा प्रश्न पूछा, "ऐसी कौन सी चीज़ है, जिसे जितना छुपाओ, उतनी ही प्रकट होती है?"
तेनालीराम ने तुरंत उत्तर दिया, "सच्चाई।"
अब तो दरबारियों ने भी तेनालीराम की हाजिरजवाबी की प्रशंसा की। रुद्रभट्ट का चेहरा तमतमा उठा, उसने सोचा, अब थोड़ा कठिन प्रश्न पूछता हूँ।
उसने एक जटिल संस्कृत श्लोक पढ़ा और बोला, "इसका अर्थ बताइए।"
तेनालीराम ने मुस्कराकर कहा, "पंडित जी, अर्थ तो बताऊँगा, लेकिन पहले आप यह बताइए कि इतने ज्ञान के बाद भी आपके व्यवहार में विनम्रता क्यों नहीं है?"
रुद्रभट्ट भौचक्का रह गया। उसने कहा, "मैं श्रेष्ठ हूँ, इसलिए...!"
तेनालीराम ने कहा, "ज्ञान की असली पहचान विनम्रता है। जैसे आम का पेड़ जितना फलदार होता है, उतना ही झुक जाता है।"
राजा कृष्णदेव राय ने ताली बजाई, "बहुत सुंदर तेनाली! यही तो असली विद्या है—जो जितना बड़ा होता है, उतना ही विनम्र होता है।"
रुद्रभट्ट का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने संकोच के साथ तेनालीराम से कहा, "आपने सही कहा, मुझे अपनी भूल स्वीकार है। मैं उन सभी से क्षमा चाहता हूँ, जिन्हें मैंने अपमानित किया।"
तेनालीराम ने मुस्कराकर कहा, "पंडित जी, ज्ञान का सबसे बड़ा गहना विनय है। जब तक उसमें नम्रता नहीं, वह अधूरा है।"
दरबार में सभी ने तेनालीराम की प्रशंसा की। रुद्रभट्ट ने विनम्र होकर राजा और तेनालीराम को धन्यवाद दिया और वादा किया कि आगे से वह अपने ज्ञान के साथ विनम्रता का भी पालन करेगा।
उस दिन से दरबार में एक नई कहावत प्रचलित हुई— "ज्ञान बड़ा नहीं, ज्ञान के साथ नम्रता सबसे बड़ी।"
तेनालीराम की बुद्धिमत्ता और उसकी सीख से पूरा दरबार गूंज उठा। सबने समझा कि कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो, अगर उसमें विनम्रता नहीं, तो उसका ज्ञान अधूरा है।
उस दिन के बाद विजयनगर में हर किसी ने तेनालीराम की बात गाँठ बाँध ली— "ज्ञान के साथ-साथ विनम्रता जरूरी है।"
यही थी तेनालीराम की सीख, जो आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी तब थी।