तेनालीराम और धुएँ को मापने की चुनौती
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तेनालीराम और धुएँ को मापने की चुनौती

तेनालीराम को राजा कृष्णदेव राय ने असंभव कार्य—धुएँ को मापने—की चुनौती दी। सुनिए कैसे तेनालीराम अपनी चतुराई और रचनात्मक सोच से सबको चौंका देते हैं।

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by Storiyaa Editorial

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विजयनगर साम्राज्य का महल सवेरे की सुनहरी किरणों से जगमगा रहा था। दरबार में राजा कृष्णदेव राय अपने दरबारियों के साथ बैठे थे। सभी की निगाहें तेनालीराम पर थीं, जिनकी चतुराई के किस्से दूर-दूर तक मशहूर थे। राजा मुस्कुराते हुए बोले, “तेनाली, आज मैं तुम्हें एक ऐसा काम देना चाहता हूँ जो अब तक किसी ने नहीं किया।” तेनालीराम ने विनम्रता से सिर झुकाया, “आज्ञा दीजिए महाराज, मैं पूरी कोशिश करूँगा।” राजा ने गम्भीर स्वर में कहा, “मुझे चाहिए कि तुम धुएँ को माप कर लाओ। बताओ, क्या तुम यह कर सकते हो?” दरबार में हल्की सी हँसी गूंज उठी। मंत्री और दरबारी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगे। धुआँ तो न दिखाई देता है, न पकड़ा जा सकता है, फिर उसे मापे कौन! तेनालीराम ने मुस्कराते हुए राजा से पूछा, “महाराज, क्या धुआँ किसी बर्तन में भरकर लाया जा सकता है?” राजा ने हँसते हुए कहा, “बस, मुझे धुएँ की नाप चाहिए, तरीका तुम्हारा।” तेनाली ने सिर झुकाया और बोला, “ठीक है महाराज, सात दिनों का समय दीजिए। मैं धुएँ को मापकर आपको दिखाऊँगा।” राजा ने सिर हिलाया और दरबार में हलचल मच गई। कुछ लोग सोचने लगे, क्या तेनाली सचमुच यह असंभव कार्य कर पाएगा? रात को तेनाली अपनी पत्नी के पास पहुँचे। पत्नी ने पूछा, “आज इतने गम्भीर क्यों हो?” तेनाली ने पूरी बात बताई। पत्नी मुस्कुरा कर बोली, “तुम तो हर मुश्किल का हल जानते हो, इस बार भी कुछ नया सोचो।” तेनालीराम रात भर सोचते रहे। कभी छत की कड़ियों को देखते, कभी दीये की लौ को। अचानक उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। सुबह होते ही वे बाजार पहुँचे और एक बड़ा मटका, कुछ लकड़ियाँ और गुड़ खरीदा। अगले दिन वे गाँव के बाहर पहुँचे। वहाँ उन्होंने लकड़ियाँ जलाईं और ऊपर मटका रखा। जैसे ही लकड़ियाँ सुलगने लगीं, मटके में धुआँ भर गया। तेनालीराम ने जल्दी से मटके का मुंह कपड़े से बाँध दिया। वह मटका लेकर दरबार पहुँचे और बोले, “महाराज, मैंने धुएँ को माप लिया है।” राजा और दरबारी चकित हो गए। राजा ने मुस्कुराकर पूछा, “कैसे?” तेनालीराम ने मटके का ढक्कन हटाया। भीतर से थोड़ी सी राख दिखाई दी। तेनालीराम बोले, “महाराज, जब लकड़ी जली, तब धुआँ निकला। यही धुआँ मटके में भरा और अंत में राख बन गया। लकड़ी जितनी जली, उतना ही धुआँ निकला। यदि आप लकड़ी का वजन नाप लें, तो आप उस धुएँ की मात्रा भी जान लेंगे, जो उससे बना। इस तरह धुआँ मापना सम्भव है, बस तरीका नया चाहिए।” दरबार में सन्नाटा छा गया, फिर तालियों की गूंज उठी। मंत्री, जो तेनाली की परीक्षा लेना चाहते थे, सिर झुका कर मुस्कुराए। राजा ने तेनालीराम की पीठ थपथपाई, “तुमने फिर साबित कर दिया कि सोचने का ढंग सबसे अहम है। असंभव दिखने वाले काम भी नए तरीके से हल किए जा सकते हैं।” तेनालीराम ने विनम्रता से कहा, “महाराज, समस्याएँ बड़ी नहीं होतीं, बस हमें उन्हें हल करने का तरीका नया खोजना चाहिए।” राजा ने घोषणा की, “तेनाली की चतुराई और रचनात्मक सोच सबके लिए एक शिक्षा है। सोच बदलो, तो समाधान आसान हो जाता है।” उस दिन से दरबार में हर कोई सोचने लगा कि मुश्किल से मुश्किल काम भी आसान हो सकते हैं, अगर हम अलग नजरिए से देखें और धैर्य के साथ नए रास्ते तलाशें। तेनालीराम की यह कहानी आज भी सबको यही सिखाती है—कठिन परिस्थिति में घबराओ मत, सिर्फ़ रचनात्मक सोच और धैर्य से अपनी राह खुद बना लो। समाप्त.

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