खरगोश का त्याग: एक प्रेरणादायक कहानी
Folklore

खरगोश का त्याग: एक प्रेरणादायक कहानी

जब एक भूखा साधु जंगल में सहायता मांगता है, एक दयालु खरगोश अपनी जान देने को तैयार हो जाता है। उसकी निःस्वार्थता देखकर साधु अपना असली दिव्य रूप प्रकट कर...

by Storiyaa Editorial
पंचतंत्र की कहानियाँ

Episode 22 of 25

पंचतंत्र की कहानियाँ

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ईर्ष्या की आग: रानी, हाथी और पूर्व जन्म की कथा

  1. बातूनी कछुआ - एक जानलेवा चुप्पी

    Ep 14:0764 plays

  2. नेवले का बलिदान - पंचतंत्र की कहानी

    Ep 25:5814 plays

  3. बंदर और मगरमच्छ

    Ep 31:2713 plays3 ✦

  4. नीला सियार

    Ep 42:085 plays3 ✦

  5. चालाक बगुला और समझदार केकड़ा

    Ep 54:0060 plays3 ✦

  6. पंचतंत्र की मित्रता: चूहों और हाथियों की कथा

    Ep 63:315 plays3 ✦

  7. चालाक खरगोश और शेर का अक्स

    Ep 74:057 plays3 ✦

  8. कौए और सियार की चालाकी: पंचतंत्र की कहानी

    Ep 83:215 plays3 ✦

  9. सांप, नेवला और अधीर माँ: पंचतंत्र की सीख

    Ep 93:393 plays3 ✦

  10. शेर और चूहे की दोस्ती: ईसप की सीख

    Ep 103:171 play3 ✦

  11. लोमड़ी और खट्टी अंगूर की कहानी (ईसप की कथा)

    Ep 113:353 ✦

  12. सच्ची मित्रता और भालू की सीख

    Ep 123:0016 plays3 ✦

  13. चालाक कौआ और घड़े की सीख

    Ep 133:423 ✦

  14. चालाक गीदड़ और भूखा बाघ: लोककथा की सीख

    Ep 143:233 ✦

  15. चालाक सियार और भोला हिरन: पंचतंत्र की सीख

    Ep 153:543 ✦

  16. ब्राह्मण, बकरी और तीन चालाक चोरों की कहानी

    Ep 163:203 plays3 ✦

  17. बंदर की नकलची आदत और दुखद सजा

    Ep 173:543 ✦

  18. शेर, ऊँट और चालाक सियार की कहानी

    Ep 183:413 ✦

  19. शेर की खाल में गधा: पंचतंत्र की सीख

    Ep 192:553 ✦

  20. धर्म की परीक्षा: राजकुमार की अनोखी परीक्षा

    Ep 203:453 plays3 ✦

  21. बलिदानी बंदर राजाः एक प्रेरणादायक जातक कथा

    Ep 213:543 ✦

  22. खरगोश का त्याग: एक प्रेरणादायक कहानी

    Ep 223:573 ✦

  23. ईर्ष्या की आग: रानी, हाथी और पूर्व जन्म की कथा

    Ep 234:093 ✦

  24. सुनहरे हिरण राजा की करुणा और बलिदान

    Ep 244:053 ✦

  25. हँसी का इलाज: राजा और वैद्य की कहानी

    Ep 254:153 ✦

About This Story

Story Transcript

बहुत समय पहले की बात है। एक घना जंगल था, जिसमें तरह-तरह के जानवर रहते थे—हिरन, बंदर, सियार और एक छोटा, सफेद खरगोश। ये चारों मित्र थे और हर दिन एक-दूसरे के साथ भोजन खोजने और जीवन का आनंद लेने जंगल में घूमते रहते थे। एक दिन जंगल में खबर फैली कि अगला दिन पवित्र उपवास का दिन है। सभी जानवरों ने तय किया कि वे उपवास करेंगे और जरूरतमंद किसी भी यात्री या गरीब को भोजन कराएँगे। अगले दिन, सुबह होते ही चारों ने अपने-अपने घर साफ किए, और मन में यह सोचकर बैठे रहे कि आज कौन आएगा जिसे वे भोजन करा सकेंगे। सबसे पहले, हिरन ने अपने घर के पास हरी घास और पत्तों का ढेर इकट्ठा किया। बंदर ने पेड़ों से मीठे-मीठे फल तोड़कर रख लिए। सियार ने कहीं से बचा-खुचा मांस खोजकर सहेज लिया। पर बेचारा खरगोश दुखी था। वह सोच रहा था, "मैं तो घास-पत्ते ही खाता हूँ, दूसरों को क्या दे पाऊँगा? मेरे पास देने के लिए कुछ भी तो नहीं है।" तभी दोपहर के समय एक थका-हारा साधु जंगल से गुज़रा। उसके कपड़े फटे थे, चेहरा मुरझाया हुआ और वह बहुत भूखा था। सबसे पहले वह हिरन के पास पहुँचा। हिरन ने आदरपूर्वक उसे हरी घास और पत्ते खाने को दिए। साधु मुसकराया और धन्यवाद देकर आगे बढ़ गया। फिर साधु बंदर के पास पहुँचा। बंदर ने उसे रसदार फल भेंट किए। साधु ने खुशी से फल खाए, आशीर्वाद दिया और आगे बढ़ गया। सियार ने भी साधु को मांस का टुकड़ा दिया, जिसे साधु ने स्वीकार किया। अंत में साधु खरगोश के पास पहुँचा। खरगोश ने सिर झुकाया और दुखी होकर बोला, "महाराज, क्षमा करें, मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। मैं केवल घास खाता हूँ, और वही दे सकता हूँ, लेकिन वह आपके योग्य नहीं है।" साधु मुस्कराए और बोले, "तो फिर क्या करोगे बेटा?" खरगोश कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "महाराज, यदि आप सचमुच भूखे हैं, तो मैं आपकी भूख मिटाने के लिए अपनी जान तक दे सकता हूँ। आप मेरी देह को भोजन बना लें। यही मेरा सबसे बड़ा दान होगा।" यह सुनकर साधु गंभीर हो गए, "क्या सच में, बेटा? क्या तुम अपनी जान दे सकते हो?" खरगोश ने सिर ऊँचा किया और दृढ़ता से कहा, "हाँ, महाराज। मेरे पास देने के लिए और कुछ नहीं, परंतु आपकी सेवा करना मेरा धर्म है।" तभी साधु ने अपने कमंडल से अग्नि प्रकट की और बोला, "यदि तुम्हारा इरादा सच्चा है, तो इस अग्नि में कूद जाओ।" खरगोश ने बिना डरे, बिना एक पल रुके, भगवान् का स्मरण किया और चुपचाप अग्नि में कूदने को तैयार हो गया। उसने जैसे ही छलाँग लगाई, अग्नि ठंडी हो गई और साधु का चेहरा चमकने लगा। साधु का रूप बदल गया—उनके सिर पर तेज मुकुट, शरीर से दिव्य प्रकाश निकलने लगा। यह देखकर हिरन, बंदर, और सियार भी वहाँ दौड़े चले आए। साधु बोले, "हे प्रिय खरगोश, मैं कोई साधु नहीं, स्वयं इंद्र हूँ। तुम्हारी निःस्वार्थता और बलिदान की भावना से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा नाम संसार में सदा अमर रहेगा।" खरगोश चौंक उठा, "भगवान्! मैंने तो केवल अपना कर्तव्य निभाया।" इंद्र ने अपने हाथ से चाँद के ऊपर खरगोश की छवि अंकित कर दी और आशीर्वाद दिया, "अब से लोग जब भी पूर्णिमा की रात चाँद देखेंगे, उन्हें तुम्हारा त्याग और सेवा याद आएगी।" चारों मित्र प्रसन्न हुए। जंगल के सभी जानवरों ने खरगोश की प्रशंसा की। आज भी, जब आप पूर्णिमा की रात को चाँद की ओर देखते हैं, तो उसमें एक छोटा-सा खरगोश बैठा दिखाई देता है। यह उसी निःस्वार्थ खरगोश की याद दिलाता है जिसने सच्चे सेवाभाव और त्याग का मार्ग दिखाया। इससे हमें यह सीख