जब एक भूखा साधु जंगल में सहायता मांगता है, एक दयालु खरगोश अपनी जान देने को तैयार हो जाता है। उसकी निःस्वार्थता देखकर साधु अपना असली दिव्य रूप प्रकट कर...
बहुत समय पहले की बात है। एक घना जंगल था, जिसमें तरह-तरह के जानवर रहते थे—हिरन, बंदर, सियार और एक छोटा, सफेद खरगोश। ये चारों मित्र थे और हर दिन एक-दूसरे के साथ भोजन खोजने और जीवन का आनंद लेने जंगल में घूमते रहते थे।
एक दिन जंगल में खबर फैली कि अगला दिन पवित्र उपवास का दिन है। सभी जानवरों ने तय किया कि वे उपवास करेंगे और जरूरतमंद किसी भी यात्री या गरीब को भोजन कराएँगे।
अगले दिन, सुबह होते ही चारों ने अपने-अपने घर साफ किए, और मन में यह सोचकर बैठे रहे कि आज कौन आएगा जिसे वे भोजन करा सकेंगे। सबसे पहले, हिरन ने अपने घर के पास हरी घास और पत्तों का ढेर इकट्ठा किया। बंदर ने पेड़ों से मीठे-मीठे फल तोड़कर रख लिए। सियार ने कहीं से बचा-खुचा मांस खोजकर सहेज लिया।
पर बेचारा खरगोश दुखी था। वह सोच रहा था, "मैं तो घास-पत्ते ही खाता हूँ, दूसरों को क्या दे पाऊँगा? मेरे पास देने के लिए कुछ भी तो नहीं है।"
तभी दोपहर के समय एक थका-हारा साधु जंगल से गुज़रा। उसके कपड़े फटे थे, चेहरा मुरझाया हुआ और वह बहुत भूखा था। सबसे पहले वह हिरन के पास पहुँचा। हिरन ने आदरपूर्वक उसे हरी घास और पत्ते खाने को दिए। साधु मुसकराया और धन्यवाद देकर आगे बढ़ गया।
फिर साधु बंदर के पास पहुँचा। बंदर ने उसे रसदार फल भेंट किए। साधु ने खुशी से फल खाए, आशीर्वाद दिया और आगे बढ़ गया।
सियार ने भी साधु को मांस का टुकड़ा दिया, जिसे साधु ने स्वीकार किया।
अंत में साधु खरगोश के पास पहुँचा। खरगोश ने सिर झुकाया और दुखी होकर बोला, "महाराज, क्षमा करें, मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। मैं केवल घास खाता हूँ, और वही दे सकता हूँ, लेकिन वह आपके योग्य नहीं है।"
साधु मुस्कराए और बोले, "तो फिर क्या करोगे बेटा?"
खरगोश कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "महाराज, यदि आप सचमुच भूखे हैं, तो मैं आपकी भूख मिटाने के लिए अपनी जान तक दे सकता हूँ। आप मेरी देह को भोजन बना लें। यही मेरा सबसे बड़ा दान होगा।"
यह सुनकर साधु गंभीर हो गए, "क्या सच में, बेटा? क्या तुम अपनी जान दे सकते हो?"
खरगोश ने सिर ऊँचा किया और दृढ़ता से कहा, "हाँ, महाराज। मेरे पास देने के लिए और कुछ नहीं, परंतु आपकी सेवा करना मेरा धर्म है।"
तभी साधु ने अपने कमंडल से अग्नि प्रकट की और बोला, "यदि तुम्हारा इरादा सच्चा है, तो इस अग्नि में कूद जाओ।"
खरगोश ने बिना डरे, बिना एक पल रुके, भगवान् का स्मरण किया और चुपचाप अग्नि में कूदने को तैयार हो गया।
उसने जैसे ही छलाँग लगाई, अग्नि ठंडी हो गई और साधु का चेहरा चमकने लगा। साधु का रूप बदल गया—उनके सिर पर तेज मुकुट, शरीर से दिव्य प्रकाश निकलने लगा। यह देखकर हिरन, बंदर, और सियार भी वहाँ दौड़े चले आए।
साधु बोले, "हे प्रिय खरगोश, मैं कोई साधु नहीं, स्वयं इंद्र हूँ। तुम्हारी निःस्वार्थता और बलिदान की भावना से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा नाम संसार में सदा अमर रहेगा।"
खरगोश चौंक उठा, "भगवान्! मैंने तो केवल अपना कर्तव्य निभाया।"
इंद्र ने अपने हाथ से चाँद के ऊपर खरगोश की छवि अंकित कर दी और आशीर्वाद दिया, "अब से लोग जब भी पूर्णिमा की रात चाँद देखेंगे, उन्हें तुम्हारा त्याग और सेवा याद आएगी।"
चारों मित्र प्रसन्न हुए। जंगल के सभी जानवरों ने खरगोश की प्रशंसा की।
आज भी, जब आप पूर्णिमा की रात को चाँद की ओर देखते हैं, तो उसमें एक छोटा-सा खरगोश बैठा दिखाई देता है। यह उसी निःस्वार्थ खरगोश की याद दिलाता है जिसने सच्चे सेवाभाव और त्याग का मार्ग दिखाया।
इससे हमें यह सीख
जब एक भूखा साधु जंगल में सहायता मांगता है, एक दयालु खरगोश अपनी जान देने को तैयार हो जाता है। उसकी निःस्वार्थता देखकर साधु अपना असली दिव्य रूप प्रकट कर...
बहुत समय पहले की बात है। एक घना जंगल था, जिसमें तरह-तरह के जानवर रहते थे—हिरन, बंदर, सियार और एक छोटा, सफेद खरगोश। ये चारों मित्र थे और हर दिन एक-दूसरे के साथ भोजन खोजने और जीवन का आनंद लेने जंगल में घूमते रहते थे।
एक दिन जंगल में खबर फैली कि अगला दिन पवित्र उपवास का दिन है। सभी जानवरों ने तय किया कि वे उपवास करेंगे और जरूरतमंद किसी भी यात्री या गरीब को भोजन कराएँगे।
अगले दिन, सुबह होते ही चारों ने अपने-अपने घर साफ किए, और मन में यह सोचकर बैठे रहे कि आज कौन आएगा जिसे वे भोजन करा सकेंगे। सबसे पहले, हिरन ने अपने घर के पास हरी घास और पत्तों का ढेर इकट्ठा किया। बंदर ने पेड़ों से मीठे-मीठे फल तोड़कर रख लिए। सियार ने कहीं से बचा-खुचा मांस खोजकर सहेज लिया।
पर बेचारा खरगोश दुखी था। वह सोच रहा था, "मैं तो घास-पत्ते ही खाता हूँ, दूसरों को क्या दे पाऊँगा? मेरे पास देने के लिए कुछ भी तो नहीं है।"
तभी दोपहर के समय एक थका-हारा साधु जंगल से गुज़रा। उसके कपड़े फटे थे, चेहरा मुरझाया हुआ और वह बहुत भूखा था। सबसे पहले वह हिरन के पास पहुँचा। हिरन ने आदरपूर्वक उसे हरी घास और पत्ते खाने को दिए। साधु मुसकराया और धन्यवाद देकर आगे बढ़ गया।
फिर साधु बंदर के पास पहुँचा। बंदर ने उसे रसदार फल भेंट किए। साधु ने खुशी से फल खाए, आशीर्वाद दिया और आगे बढ़ गया।
सियार ने भी साधु को मांस का टुकड़ा दिया, जिसे साधु ने स्वीकार किया।
अंत में साधु खरगोश के पास पहुँचा। खरगोश ने सिर झुकाया और दुखी होकर बोला, "महाराज, क्षमा करें, मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। मैं केवल घास खाता हूँ, और वही दे सकता हूँ, लेकिन वह आपके योग्य नहीं है।"
साधु मुस्कराए और बोले, "तो फिर क्या करोगे बेटा?"
खरगोश कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "महाराज, यदि आप सचमुच भूखे हैं, तो मैं आपकी भूख मिटाने के लिए अपनी जान तक दे सकता हूँ। आप मेरी देह को भोजन बना लें। यही मेरा सबसे बड़ा दान होगा।"
यह सुनकर साधु गंभीर हो गए, "क्या सच में, बेटा? क्या तुम अपनी जान दे सकते हो?"
खरगोश ने सिर ऊँचा किया और दृढ़ता से कहा, "हाँ, महाराज। मेरे पास देने के लिए और कुछ नहीं, परंतु आपकी सेवा करना मेरा धर्म है।"
तभी साधु ने अपने कमंडल से अग्नि प्रकट की और बोला, "यदि तुम्हारा इरादा सच्चा है, तो इस अग्नि में कूद जाओ।"
खरगोश ने बिना डरे, बिना एक पल रुके, भगवान् का स्मरण किया और चुपचाप अग्नि में कूदने को तैयार हो गया।
उसने जैसे ही छलाँग लगाई, अग्नि ठंडी हो गई और साधु का चेहरा चमकने लगा। साधु का रूप बदल गया—उनके सिर पर तेज मुकुट, शरीर से दिव्य प्रकाश निकलने लगा। यह देखकर हिरन, बंदर, और सियार भी वहाँ दौड़े चले आए।
साधु बोले, "हे प्रिय खरगोश, मैं कोई साधु नहीं, स्वयं इंद्र हूँ। तुम्हारी निःस्वार्थता और बलिदान की भावना से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा नाम संसार में सदा अमर रहेगा।"
खरगोश चौंक उठा, "भगवान्! मैंने तो केवल अपना कर्तव्य निभाया।"
इंद्र ने अपने हाथ से चाँद के ऊपर खरगोश की छवि अंकित कर दी और आशीर्वाद दिया, "अब से लोग जब भी पूर्णिमा की रात चाँद देखेंगे, उन्हें तुम्हारा त्याग और सेवा याद आएगी।"
चारों मित्र प्रसन्न हुए। जंगल के सभी जानवरों ने खरगोश की प्रशंसा की।
आज भी, जब आप पूर्णिमा की रात को चाँद की ओर देखते हैं, तो उसमें एक छोटा-सा खरगोश बैठा दिखाई देता है। यह उसी निःस्वार्थ खरगोश की याद दिलाता है जिसने सच्चे सेवाभाव और त्याग का मार्ग दिखाया।
इससे हमें यह सीख