ब्राह्मण, बकरी और तीन चालाक चोरों की कहानी
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ब्राह्मण, बकरी और तीन चालाक चोरों की कहानी

पंचतंत्र की इस मनोरंजक कहानी में जानिए कैसे तीन चालाक चोरों ने एक ब्राह्मण को उसकी बकरी से अलग कर दिया और अंत में क्या सिख मिलती है।

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by Storiyaa Editorial
पंचतंत्र की कहानियाँ

Episode 16 of a series

पंचतंत्र की कहानियाँ

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Story Transcript

बहुत समय पहले की बात है। एक गांव में हरिदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था। हरिदत्त बहुत ही ईमानदार और सीधा-सादा इंसान था। एक दिन गांव के लोगों ने उसके अच्छे कामों से खुश होकर उसे एक सुंदर सी बकरी उपहार में दी। हरिदत्त बहुत खुश हुआ और बकरी को अपने कंधे पर रखकर घर की ओर चल पड़ा। रास्ता लंबा था और जंगल से होकर गुजरता था। उसी जंगल में तीन चालाक चोर रहते थे। उन्होंने हरिदत्त को बकरी लेकर जाते देखा और बकरी को पाने की योजना बनाई। वे जानते थे कि सीधा-सादा ब्राह्मण आसानी से उनकी चाल में आ सकता है। तीनों ने मिलकर योजना बनाई कि वे बारी-बारी से ब्राह्मण को भ्रमित करेंगे और उसे ये यकीन दिलाएंगे कि वह बकरी नहीं, बल्कि कोई और जानवर ले जा रहा है। जैसे ही ब्राह्मण जंगल के बीच पहुंचा, पहला चोर उसके पास आया। उसने ब्राह्मण को घूरकर देखा और हैरानी से बोला, "महोदय, आप इतने विद्वान होकर अपने कंधे पर कुत्ता क्यों ले जा रहे हैं? यह तो बड़ा अजीब है!" हरिदत्त चौंक गया, बोला, "यह कुत्ता नहीं, बकरी है। क्या तुम्हें ठीक से दिखाई नहीं देता?" पहला चोर सिर झुकाकर बोला, "माफ कीजिए, मैंने गलत देखा होगा," और वह वहां से चला गया। ब्राह्मण थोड़ा संदेह में तो आया, पर आगे बढ़ गया। कुछ दूर आगे बढ़ने पर दूसरा चोर मिला। उसने ब्राह्मण की ओर देखा और बोला, "हे ब्राह्मण, आप अपने कंधे पर गधा क्यों उठाए हुए हैं? आपके जैसे ज्ञानी पुरुष के लिए यह शोभा नहीं देता।" अब ब्राह्मण हैरान रह गया। उसे गुस्सा आया और बोला, "यह गधा नहीं, बकरी है! तुम लोग अजीब-अजीब बातें क्यों कर रहे हो?" दूसरा चोर हंसते हुए बोला, "अगर आप मानते हैं तो ठीक है।" और वह चला गया। हरिदत्त अब परेशान हो गया। उसने दो लोगों को अलग-अलग जानवर बताते सुना था। उसके मन में शंका घर करने लगी। ब्राह्मण जब और थोड़ा आगे बढ़ा तो तीसरा चोर उसके सामने आकर बोला, "महोदय, आप अपने कंधे पर मरा हुआ बछड़ा क्यों ढो रहे हैं? यह तो अपवित्र है!" हरिदत्त अब घबरा गया था। वह कांपती आवाज़ में बोला, "यह मरा हुआ बछड़ा नहीं, यह तो बकरी है, जो मुझे लोगों ने दी है।" तीसरा चोर बोला, "अगर आप ऐसा कहते हैं तो ठीक है, लेकिन मुझे तो यह मरा बछड़ा ही लगा।" अब ब्राह्मण पूरी तरह भ्रमित हो गया। उसने सोचा, तीन-तीन अलग-अलग लोग अलग-अलग जानवर बता रहे हैं, तो जरूर इसमें कुछ गड़बड़ है। शायद यह बकरी असल में कोई भूत है या मेरी आंखों का धोखा है। डर और भ्रमित होकर उसने बकरी को झाड़ियों में छोड़ दिया और भाग गया। तीनों चोर छिपे हुए थे। जैसे ही ब्राह्मण वहां से भागा, वे झाड़ियों से बाहर आए और बकरी लेकर हंसी-खुशी अपने घर चले गए। घर पहुंचकर ब्राह्मण ने अपने परिवार को पूरी बात बताई। उसकी पत्नी बोली, "अगर तुमने अपनी आंखों और समझ पर विश्वास किया होता, तो आज बकरी हमारे पास होती।" इस कहानी से हमें यह सिख मिलती है कि दूसरों की बातों में आकर अपने अनुभव और ज्ञान को कभी न भूलें। जो अपनी समझ का इस्तेमाल नहीं करता, वह अक्सर धोखा खा जाता है।

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