पंचतंत्र की इस प्रसिद्ध कहानी में एक बंदर बढ़ई की नकल करने की कोशिश करता है, जिससे उसे कठिनाई का सामना करना पड़ता है। जानिए कैसे नकल करने से कभी-कभी ब...
बहुत समय पहले एक हरे-भरे जंगल के पास एक छोटा सा गाँव बसा हुआ था। गाँव के किनारे एक बड़ा तालाब था, जिसके आसपास किसान और मजदूर अपना काम करते थे। एक दिन गाँव में दो बढ़ई आए, जिनका नाम था रामलाल और श्यामलाल। वे तालाब के पास एक सुंदर लकड़ी का पुल बनाने लगे। उनके पास औजारों की एक थैली थी—आरी, हथौड़ा, छेनी, और कुछ कीलें।
तालाब के किनारे एक बड़ा बरगद का पेड़ था। उस पेड़ पर कई बंदर रहते थे। उन बंदरों में सबसे शरारती और चंचल था चुन्नू। चुन्नू को हर नई चीज़ में दिलचस्पी थी, और वह हमेशा इंसानों की नकल करने की कोशिश करता था।
एक दिन, जैसे ही सूरज की किरणें तालाब के पानी पर चमकने लगीं, रामलाल और श्यामलाल काम करने आ गए। उन्होंने एक बड़ा लकड़ी का लट्ठा रखा और उसके बीच में एक दरार बनाई, ताकि वह उसे अलग-अलग टुकड़ों में काट सकें। दरार को खुला रखने के लिए उन्होंने एक मजबूत कीला उसमे फंसा कर रख दिया। दोनों जोर-जोर से काम करने लगे—कभी कीला ठोकते, कभी लकड़ी काटते, तो कभी छेनी से छीलते।
चुन्नू पेड़ पर बैठा सब देख रहा था। वह सोचने लगा, "अरे, ये लोग क्या मज़ेदार काम कर रहे हैं! मुझे भी तो ऐसा करने का मन करता है।" चुन्नू ने देखा कि जैसे ही दोपहर हुई, दोनों बढ़ई थककर खाना खाने लगे और अपने औजार पास ही छोड़ दिए।
बस, जैसे ही बढ़ई वहाँ से हटे, चुन्नू लपककर नीचे आ गया। उसने बढ़ई के काम की नकल करने का निश्चय कर लिया। पहले तो वह औजारों को छू-छूकर देखने लगा—कभी हथौड़ा, कभी आरी। फिर उसकी नजर सामने पड़े बड़े लट्ठे पर गई, जिसमें अभी भी कीला फंसा था।
चुन्नू ने सोचा, "लगता है ये कीला निकालने में बड़ा मज़ा आएगा।" वह लट्ठे के ऊपर चढ़ गया और दोनों पैरों को दरार के दोनों ओर रख दिया, ठीक वैसे ही जैसे उसने बढ़ई को करते देखा था। फिर उसने अपने नुकीले पंजों से कीला पकड़कर जोर लगाना शुरू कर दिया।
कीला थोड़ा सा हिला, और चुन्नू को लगा कि वह बढ़ई जैसा ही मज़ा महसूस कर रहा है। उसने एक जोरदार झटका मारा, और कीला बाहर आ गया। लेकिन जैसे ही कीला निकला, लकड़ी की दरार तुंरत बंद हो गई। चुन्नू के पैर दरार के दोनों तरफ थे, और उसका निचला हिस्सा उसी दरार में फँस गया।
चुन्नू दर्द से चिल्लाया, "ओह! ये मैंने क्या किया!" लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। वह जितना छटपटाता, दरार उतनी ही कस जाती। बंदर के दोस्त पेड़ से झाँक रहे थे, लेकिन कोई भी उसकी मदद नहीं कर सकता था।
कुछ देर बाद दोनों बढ़ई काम पर लौटे। उन्होंने देखा कि चुन्नू फँसा हुआ है और दर्द से तड़प रहा है। रामलाल ने कहा, "अरे, यही होता है जब कोई बिना समझे नकल करता है।" श्यामलाल ने चुन्नू को धीरे से निकालने की कोशिश की, लेकिन चुन्नू डर के मारे वहाँ से कूदकर भाग गया।
उस दिन के बाद चुन्नू ने कभी किसी इंसान की नकल करने की कोशिश नहीं की। उसके दोस्तों ने भी उससे सबक सीखा कि हर बात की नकल करना ठीक नहीं होता, खासकर जब उसके पीछे की समझ न हो।
अंत में, जंगल के सारे बंदर चुन्नू की गलती से सीख गए कि नकल करते समय सतर्क रहना चाहिए। बिना सोचे-समझे नकल करने से नुकसान भी हो सकता है।
इस कहानी की सीख है—अंधी नकल करना नुक़सानदायक हो सकता है। नकल करने से पहले हमेशा सोचें और समझें, तभी आप सुरक्षित रह सकते हैं।
पंचतंत्र की इस प्रसिद्ध कहानी में एक बंदर बढ़ई की नकल करने की कोशिश करता है, जिससे उसे कठिनाई का सामना करना पड़ता है। जानिए कैसे नकल करने से कभी-कभी ब...
बहुत समय पहले एक हरे-भरे जंगल के पास एक छोटा सा गाँव बसा हुआ था। गाँव के किनारे एक बड़ा तालाब था, जिसके आसपास किसान और मजदूर अपना काम करते थे। एक दिन गाँव में दो बढ़ई आए, जिनका नाम था रामलाल और श्यामलाल। वे तालाब के पास एक सुंदर लकड़ी का पुल बनाने लगे। उनके पास औजारों की एक थैली थी—आरी, हथौड़ा, छेनी, और कुछ कीलें।
तालाब के किनारे एक बड़ा बरगद का पेड़ था। उस पेड़ पर कई बंदर रहते थे। उन बंदरों में सबसे शरारती और चंचल था चुन्नू। चुन्नू को हर नई चीज़ में दिलचस्पी थी, और वह हमेशा इंसानों की नकल करने की कोशिश करता था।
एक दिन, जैसे ही सूरज की किरणें तालाब के पानी पर चमकने लगीं, रामलाल और श्यामलाल काम करने आ गए। उन्होंने एक बड़ा लकड़ी का लट्ठा रखा और उसके बीच में एक दरार बनाई, ताकि वह उसे अलग-अलग टुकड़ों में काट सकें। दरार को खुला रखने के लिए उन्होंने एक मजबूत कीला उसमे फंसा कर रख दिया। दोनों जोर-जोर से काम करने लगे—कभी कीला ठोकते, कभी लकड़ी काटते, तो कभी छेनी से छीलते।
चुन्नू पेड़ पर बैठा सब देख रहा था। वह सोचने लगा, "अरे, ये लोग क्या मज़ेदार काम कर रहे हैं! मुझे भी तो ऐसा करने का मन करता है।" चुन्नू ने देखा कि जैसे ही दोपहर हुई, दोनों बढ़ई थककर खाना खाने लगे और अपने औजार पास ही छोड़ दिए।
बस, जैसे ही बढ़ई वहाँ से हटे, चुन्नू लपककर नीचे आ गया। उसने बढ़ई के काम की नकल करने का निश्चय कर लिया। पहले तो वह औजारों को छू-छूकर देखने लगा—कभी हथौड़ा, कभी आरी। फिर उसकी नजर सामने पड़े बड़े लट्ठे पर गई, जिसमें अभी भी कीला फंसा था।
चुन्नू ने सोचा, "लगता है ये कीला निकालने में बड़ा मज़ा आएगा।" वह लट्ठे के ऊपर चढ़ गया और दोनों पैरों को दरार के दोनों ओर रख दिया, ठीक वैसे ही जैसे उसने बढ़ई को करते देखा था। फिर उसने अपने नुकीले पंजों से कीला पकड़कर जोर लगाना शुरू कर दिया।
कीला थोड़ा सा हिला, और चुन्नू को लगा कि वह बढ़ई जैसा ही मज़ा महसूस कर रहा है। उसने एक जोरदार झटका मारा, और कीला बाहर आ गया। लेकिन जैसे ही कीला निकला, लकड़ी की दरार तुंरत बंद हो गई। चुन्नू के पैर दरार के दोनों तरफ थे, और उसका निचला हिस्सा उसी दरार में फँस गया।
चुन्नू दर्द से चिल्लाया, "ओह! ये मैंने क्या किया!" लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था। वह जितना छटपटाता, दरार उतनी ही कस जाती। बंदर के दोस्त पेड़ से झाँक रहे थे, लेकिन कोई भी उसकी मदद नहीं कर सकता था।
कुछ देर बाद दोनों बढ़ई काम पर लौटे। उन्होंने देखा कि चुन्नू फँसा हुआ है और दर्द से तड़प रहा है। रामलाल ने कहा, "अरे, यही होता है जब कोई बिना समझे नकल करता है।" श्यामलाल ने चुन्नू को धीरे से निकालने की कोशिश की, लेकिन चुन्नू डर के मारे वहाँ से कूदकर भाग गया।
उस दिन के बाद चुन्नू ने कभी किसी इंसान की नकल करने की कोशिश नहीं की। उसके दोस्तों ने भी उससे सबक सीखा कि हर बात की नकल करना ठीक नहीं होता, खासकर जब उसके पीछे की समझ न हो।
अंत में, जंगल के सारे बंदर चुन्नू की गलती से सीख गए कि नकल करते समय सतर्क रहना चाहिए। बिना सोचे-समझे नकल करने से नुकसान भी हो सकता है।
इस कहानी की सीख है—अंधी नकल करना नुक़सानदायक हो सकता है। नकल करने से पहले हमेशा सोचें और समझें, तभी आप सुरक्षित रह सकते हैं।