बहादुर गुड़िया और जंगल की सीख
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बहादुर गुड़िया और जंगल की सीख

यह क्लासिक कहानी एक नन्हीं लड़की की है, जो अपनी दादी से मिलने जाती है और जंगल के खतरों के बीच विश्वास, आज्ञाकारिता और सहानुभूति की सीख पाती है। बच्चों...

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by Storiyaa Editorial

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Story Transcript

बहुत समय पहले की बात है, एक सुंदर गाँव में गुड़िया नाम की एक छोटी लड़की अपनी माँ और पिता के साथ रहती थी। गुड़िया बहुत प्यारी और समझदार थी, लेकिन दुनिया को जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहती थी। उसकी दादी गाँव के दूसरी ओर, एक शांत छोटे से घर में अकेली रहती थीं। गुड़िया अपनी दादी से बहुत प्यार करती थी और अक्सर उन्हें मिलने जाया करती थी। एक दिन, गुड़िया की माँ ने उसे दादी के लिए ताजे फल और गर्म रोटी की टोकरी दी। माँ ने प्यार से कहा, “गुड़िया, जंगल के रास्ते में सीधे जाना, रास्ते में किसी अजनबी से बात मत करना, और रास्ते से न भटकना।” गुड़िया ने सिर हिलाया, “मैं वादा करती हूँ, माँ!” और मुस्कुराते हुए चल पड़ी। जैसे ही गुड़िया घने जंगल में पहुँची, वहाँ हर तरफ रंग-बिरंगे फूल, चहचहाती चिड़ियाँ, और प्यारे खरगोश दिखाई देने लगे। अचानक, एक चालाक भेड़िया झाड़ियों के पीछे से निकला, उसकी आँखों में चमक थी। भेड़िए ने मीठी आवाज़ में पूछा, “तुम कहाँ जा रही हो, प्यारी बच्ची?” गुड़िया को माँ की बात याद थी, लेकिन भेड़िए की मुलायम आवाज़ और बड़ी-बड़ी आँखें देखकर वह रुक गई। उसने जवाब दिया, “मैं अपनी दादी के घर जा रही हूँ। वे बीमार हैं, मैं उन्हें फल और रोटी देने जा रही हूँ।” भेड़िए ने शरारती मुस्कान के साथ पूछा, “तुम्हारी दादी का घर कहाँ है?” गुड़िया ने भोलेपन से रास्ता बता दिया। भेड़िया बोला, “इतने सुंदर फूल हैं यहाँ, क्यों न तुम अपनी दादी के लिए कुछ फूल तोड़ लो? वे बहुत खुश होंगी।” गुड़िया को यह विचार अच्छा लगा। वह रास्ते से हटकर फूल चुनने लगी। भेड़िया, मौका देख, फौरन दादी के घर की ओर दौड़ गया। दादी के घर पहुँचते ही, भेड़िए ने दरवाज़ा खटखटाया। दादी ने पूछा, “कौन है?” भेड़िया ने गुड़िया की नकल में मीठी आवाज़ लगाई, “मैं गुड़िया हूँ, दादी!” दादी को कुछ शक हुआ, लेकिन उसने दरवाज़ा खोल दिया। भेड़िया दादी को डराकर अलमारी में बंद कर देता है और उसकी टोपी पहनकर बिस्तर पर लेट जाता है। कुछ देर बाद, गुड़िया फूलों की टोकरी लेकर दादी के घर पहुँची। उसने दरवाज़ा खटखटाया, “दादी, मैं आ गई!” अंदर से आवाज़ आई, “आ जाओ, बच्ची!” लेकिन आवाज़ कुछ अजीब थी। गुड़िया ने दरवाज़ा खोला तो देखा, दादी कुछ अलग सी लग रही थी। उसने धीरे-धीरे पूछा, “दादी, आपकी आवाज़ इतनी भारी क्यों है?” “बेटी, यह तो बुढ़ापे का असर है।” “दादी, आपके हाथ इतने बड़े क्यों हैं?” “ताकि तुम्हें अच्छे से गले लगा सकूँ।” “दादी, आपकी आँखें इतनी बड़ी क्यों हैं?” “ताकि तुम्हें अच्छे से देख सकूँ।” गुड़िया को अब डर लगने लगा। तभी उसकी नजर दादी के बिस्तर के नीचे से झांकती पूंछ पर पड़ी। वह समझ गई कि ये दादी नहीं, कोई और है। वह तुरंत पीछे हट गई और चिल्लाई, “आप कौन हैं?” भेड़िया बिस्तर से कूद पड़ा, “मैं हूँ जंगल का भेड़िया!” गुड़िया डर के मारे रोने लगी। तभी पास से गुजरता एक लकड़हारा उनकी आवाज़ सुनकर आया और भेड़िए को देख, जोर से दहाड़ा। भेड़िया डरकर खिड़की से भाग गया। लकड़हारे ने अलमारी खोली और दादी को बाहर निकाला। दादी ने गुड़िया को गले लगाते हुए कहा, “तुम बहुत बहादुर हो, लेकिन हमेशा अपनी माँ की बात माननी चाहिए।” गुड़िया ने सिर झुका लिया, “मुझे माफ़ कर दो, दादी। मुझे अपनी गलती समझ आ गई है।” दादी मुस्कुराईं, “गलती करना बुरा नहीं, उससे सीखना जरूरी है।” उस दिन के बाद, गुड़िया जब भी दादी के घर जाती, वह हमेशा रास्ते पर चलती, किसी अजनबी से बात नहीं करती और माँ की सीख

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