चाणक्य की कथा
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चाणक्य की कथा

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by Storiyaa Editorial
India Heritage & Knowledge (hi)

Episode 3 of a series

India Heritage & Knowledge (hi)

Story Transcript

स्कंदग्राम नामक एक छोटे से गांव में विष्णु गुप्त नमक बालक का जन्म हुआ था। बाल्यावस्था से ही उसकी मां विद्या में अत्यंत रमता था। उसके पिता चाणक एक विद्वान ब्राह्मण थे जो विष्णु गुप्त को प्रारंभ से ही नीति राजनीति और धर्म की शिक्षा देते थे। विष्णुगुप्त की आंखों में सदैव कुछ अलग करने की चमक रहती थी। जब भी गांव में कोई समस्या उत्पन्न होती वो अपने पिता से प्रश्न करता। पिताजी जीवन में इतनी कठिनाइयां क्यों आती है, उसके पिता मुस्कुरा कर उत्तर देते बेटा कठिनाइयां ही मनुष्य को मजबूत बनाती है और उसे सही मार्ग दिखाती हैं। एक दिन गांव में मगध के सैनिक आए और कर वसूलने वालों, गरीब लोगों की दुर्दशा देखकर विष्णु गुप्त का हृदय क्रोध और करुणा से भर उठा। उसने अपने पिता से पूछा, क्या कोई ऐसा नहीं जो इन अत्याचारों को रोक सके। पिता ने गंभीर स्वर में कहा जिस दिन तुम ज्ञान और साहस दोनों। में निपुण हो जाओगे। उसी दिन इस अंधकार का अंत होगा। यही शब्द विष्णु गुप्त के जीवन का लक्ष्य बन गए। उसने निश्चय कर लिया कि वो विद्या के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बनेगा। कम आयु में ही वो तक्षशिला विश्वविद्यालय पहुंचा। वहां उसकी दीक्षण बुद्धि और अद्भुत तर्क शक्ति देखकर गुरु जान भी आश्चर्य चकित रह गए। एक दिन गुरु ने उससे पूछा, विष्णु गुप्त तुम्हारे अनुसार संसार की सबसे बड़ी शक्ति क्या है वो शांत स्वर में बोला नीति जो राजा को न्याय प्रिय और प्रजा को निर्भय बनती है। गुरु ने प्रसन्न होकर कहा, तू एक दिन इतिहास में अमर होगा पर उसकी यात्रा सरल नहीं थी। तक्षशिला में अध्ययन के दौरान ही उसने देखा कि मगध का राजा धनानंद अपनी प्रजा पर अत्याचार कर रहा है। एक सभा में धनानंद ने विष्णु गुप्त का अपमान किया और उसे दरबार से निकाल दिया। अपमान की उसे अग्नि में विष्णु गुप्त ने प्रतिज्ञा ली। जब तक मैं इस अन्याय राजा। उसकी गाड़ी से नहीं हटाऊंगा तब तक मुझे शांति नहीं मिलेगी। इसके बाद विष्णुगुप्त चाणक्य कहलाए। अब उनकी आंखों में केवल एक ही लक्ष्य था। मगध को न्याय प्रिय और शक्तिशाली बनाना। उन्होंने गांव गांव जाकर लोगों को संगठित करना आरंभ किया। इसी यात्रा के दौरान उनकी भेंट एक तेजस्वी बालक चंद्रगुप्त से हुई। चाणक्य ने उसकी प्रतिभा को पहचान लिया और उसे राजनीति युद्ध, कला और नीति का प्रशिक्षण देने लगे। चंद्रगुप्त चाणक्य कहते राजा वही होता है जो प्रजा के दुख को समझें और उसके समाधान के लिए स्वयं को समर्पित करें। चंद्रगुप्त ने गुरु की हर शिक्षा को अपने जीवन का मंत्र बना लिया। चाणक्य ने असंतुष्ट राजाओं, सेनापतियों और जन समूह को अपनी नीति से जोड़ा धीरे-धीरे मदद के विरुद्ध एक सशक्त शक्ति तैयार हो गई। यह संघर्ष सरल नहीं था। कई बार हार मिली एक रात चंद्रगुप्त ने ठक्कर कहा। गुरुदेव क्या हम कभी सफल हो पाएंगे? चाणक्य ने मुस्कुरा कर कहा एक चींटी को देखो वो बार-बार गिरती है पर लक्ष्य तक पहुंचने से पहले हार नहीं मानती। विजय धैर्य में छुपी होती है। अंतत वर्षों की रणनीति, परिश्रम और बुद्धि से चाणक्य और चंद्रगुप्त ने धनानंद को पराजित किया। चंद्रगुप्त मगध के सम्राट बने। चाणक्य ने उन्हें अर्थशास्त्र और नीति शास्त्र के अनुसार राज्य संचालन की शिक्षा दी। मगध में अब न्याय सुरक्षा और समृद्धि का शासन स्थापित हुआ। एक दिन चंद्रगुप्त ने पूछा, गुरुदेव आपकी सबसे बड़ी शक्ति क्या है? चाणक्य ने उत्तर दिया मेरी नीति जो हर परिस्थिति में सही मार्ग दिखाती है। चाणक्य का नाम अब देश विदेश में सम्मान के साथ लिया जाने लगा। विष्णुगुप्त जो कभी एक साधारण गांव का बालक था। अब चाणक्य बनाकर समूचे भारत के लिए प्रेरणा बन गया। उसने केवल एक अत्याचारी राजा को नहीं हराया बल्कि बुद्धि। नीति और साहस से भारत के भविष्य को नया स्वरूप दिया। निष्कर्ष अब पूर्ण चाणक्य की कथा हमें यह सिखाती है कि साहस शिक्षा और नीति के बल पर कोई भी साधारण व्यक्ति असाधारण बन सकता है। सच्चा नेतृत्व वही है जो सत्य न्याय और बुद्धि का मार्ग चुनता है और उसे अंत तक निभाते हैं।

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