सैकड़ो वर्ष पूर्व किसी सुदूर गांव में एक धनी ब्राह्मण रहता था। उसका जीवन सुखमय था, लेकिन नियति ने उसे समय से पहले ही मृत्यु की गोद में सुला दिया। उसकी जाने के बाद उसकी पत्नी और दो बेटियों का जीवन घोर अंधकार में डूब गया। उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई और वे दाने-दाने को मोहताज हो गई। परंतु उसे ब्राह्मण के अच्छे कर्मों के कारण उसका पुनर्जन्म एक स्वर्ण हंस के रूप में हुआ। वह कोई साधारण हंस नहीं था बल्कि स्वयं बोधी सत्व थे। उसके पंख शुद्ध धमकते हुए सोने के थे। एक दिन अपने दिव्य ज्ञान से स्वर्ण हंस को अपने पिछले जन्म की याद आई। उसने देखा कि उसकी पूर्व पत्नी और बेटियां भयंकर गरीबी में जी रही हैं। वे फटे पुराने कपड़े पहनती थी और दूसरों के घरों में काम करती थी। हंस कर हृदय करुणा से भर गया। मुझे उनकी मदद करनी चाहिए। उसने सोचा, मैं उन्हें अपने सोने के पंख दूंगा ताकि वे अपना जीवन सुख से बिता सकें। अगली सुबह स्वर्ण हंस उड़ता हुआ उनकी झोपड़ी की छत पर बैठा। बेटियों ने जब उसे चमकते हुए सुनहरे पक्षी को देखा तो वे खुशी से चाहे उठी। मैन देखू कितना सुंदर पक्षी हंस उनके पास उतरा और मधुर स्वर में बोला, मैं तुम्हारे पिछले जन्म का पिता हूं। मैं तुम्हारी गरीबी दूर करने आया हूं। वो हंसने अपना एक सुनहरा पंख गिरा दिया। वो पथ सूरज की रोशनी में जगमगा रहा था। इस बाजार में बेच दो इससे तुम्हें बहुत धन मिलेगा। मैं समय समय पर आता रहूंगा और तुम्हें एक-एक पथ देता रहूंगा। परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने वह पथ बेचा और सुख सुविधाओं का सामान ले आए। अब उन्हें किसी के घर काम नहीं करना पड़ता था। स्वर्ण हंस हर कुछ दिनों में आता एक पथ देता और वापस उड़ जाता धीरे-धीरे व गरीब परिवार गांव। सबसे अमीर परिवार बन गया, लेकिन जहां धन आता है वहां अक्सर लालच भी अपना घर बना लेता है। मां के मन में असंतोष के बीच अंकुरित होने लगे। एक रात वो अपनी तिजोरी में रखे धान को गिन रही थी। उसने अपनी बेटियों से कहा, ये पक्षी एक जानवर है। जानवरों का कोई भरोसा नहीं। क्या पता चल उसका मन बदल जाए और वो आना बंद कर दे या कोई शिकारी से मार दे। बेटियों ने समझाया। मां वे हमारे पिता है। वे हम पर उपकार कर रहे हैं। हमें लालच नहीं करना चाहिए। लेकिन मन की आंखों पर लालच की पट्टी बंध चुकी थी तो मूर्ख हो वो चिल्लाई अगली बार जब वो आएगा तो मैं उसके सारे पंख एक ही बार में नच लूंगी। हम रातों रात दुनिया के सबसे अमीर लोग बन जाएंगे। अगले दिन स्वर्ण हंस अपनी इस करुणा के साथ झोपड़ी पर आया। मां ने बड़े प्यार का नाटक किया। आओ मेरे स्वामी मेरे पास आओ। उसने हंस को कुछ काटते हुए बुलाया हंस जो अपने परिवार पर असीम विश्वास करता था। बिना किसी संदेश के उसके पास चला गया। जैसे ही हंस उसके करीब आया। मां ने अचानक अपने दोनों हाथों से उसे। से दबोच लिया हंस घबरा गया। उसने फड़फड़ाना की कोशिश की लेकिन मन की पकड़ बहुत मजबूत थी। लालच में आंधी हो चुकी मां ने बेरहमी से हंस के सुनहरे पंख नोचना शुरु कर दिया। नहीं। छोड़ दो मुझे दर्द हो रहा है। हंस दर्द से चीखने लगा। एक-एक करके उसने उसे दयाल पक्षी के शरीर से सारी सुनहरे पंखों उखाड़ लिए। हंस का शरीर लहू लोहान हो गया। वो जमीन पर तड़पने लगा मन हंसने लगी। उसने उन सारे सुनहरे पंखों को एक टोकरी में इकट्ठा किया, लेकिन जैसे ही उसने टोकरी में देखा, उसकी मुस्कान जम गई। उसकी आंखें फटी रह गई। वे पंख अब सोने की नहीं रहे थे। वे बिल्कुल साधारण सफेद बगले के पंखों में बदल गए थे। प्रकृति का नियम है। स्वेच्छा से दिया गया दान ही फलता है। बलपूर्वक छिन गया, सोना भी रख बन जाता है। उसने अपने ही हाथों अपना सब कुछ नष्ट कर दिया था। हम जमीन पर पड़ा था। बिना पंखों की वो उड़ नहीं सकता था। मां ने उसे एक टोकरी में रख दिया। कुछ हफ्तों बाद हंस के शरीर पर नहीं पंख हो गए, लेकिन वे पंख सोने की नहीं थे बेस्ड! हरण सफेद पंख थे जैसे ही उसके पंख पूरी तरह आ गए। स्वर्ण हंस झोपड़ी से उड़ गया। हमेशा के लिए उसने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा और वो लालची मां अपने इस टूटे हुए घर में अपनी अंधे लालसा पर आंसू बहाती रह गई। क्योंकि जो अधिक की चाह में अपना विवेक खो देता है, वह अंतत वह भी खो देता है जो उसके पास होता है।