होरी की गाय: एक किसान की अधूरी चाहत by a musical wish | Storiyaa
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होरी की गाय: एक किसान की अधूरी चाहत
होरी का नाम सुनते ही पूरे गाँव की आँखों में उसकी मेहनत, ईमानदारी और गरीबी की झलक दिख जाती थी। वह सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में पहुँच जाता, मिट्टी...
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by a musical wish
▶कहानी ट्रांसक्रिप्ट
हरी का नाम सुनते ही पूरे गांव की आंखों में उसकी मेहनती ईमानदारी और गरीबी की झलक दिख जाती थी। वह सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में पहुंच जाता। मिट्टी में अपने सपनों की बुवाई करता और शाम ढले थका हारा घर लौटता। उसके दिल में एक ही ख्वाहिश थी। एक अपनी गए हो जिससे उसका घर आंगन खुशहाल हो जाए। गांव में गए होना न सिर्फ अमीरी की निशानी थी बल्कि इज्जत और आत्म सम्मान का भी प्रतीक था। होली की पत्नी धनिया उसकी इच्छा के बारे में जानती थी। पर वो अक्सर कहती हमारे नसीब में कहां यह सब है हरी भूख मिट यही बहुत है पर हरी मानता नहीं था। उसने ठान लिया था कि एक दिन उसके आंगन में भी गए बंधेगी। गांव के जमींदार पंडित दत्तात्रेय होली की मेहनत का फायदा उठाते थे। हरी इस बार खेत में ज्यादा ऊपर चाहिए। वरना कर्ज कैसे उतरेगा। हर बार यह शब्द होली के दिल में तीर की तरह छुपाते गांव का साहूकार लाल रामदयाल ब्याज पर ब्याज वसूलत रहता गए चाहिए तो पैसे भी चाहिए। समझे हो री लाल मुस्कुरा देता जैसे किसी बच्चे से उसका खिलौना छीन रहा हो। कई बार होली ने कोशिश की की पैसे बचा सके पर बीमारी त्यौहार कभी फसल खराब तो कभी बेटी की शादी हर बार पैसे खर्च हो जाते। फिर भी वो हिम्मत नहीं हारता। एक दिन वो साहूकार के पास गया। लाल एक बार और कर्ज दे दे। इस बार जरूर चुका दूंगा। मेरी चांदनी यानी गाय का सपना पूरा कर दे। लाल ने ब्याज की शर्ट और कड़ी कर दी। पर हरी ने दस्तखत कर दिए। कुछ ही दिनों में गांव के बाहर की किस से हरी ने एक दुबली पतली पर दुधारू गाय खरीदी जैसी गए। उसके घर आई। होली की आंखों में चमक आ गई। धनिया की चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर गई। बच्चे उसकी पूंछ पकड़ कर इधर-उधर दौड़ने लगे। हरी का आंगन खुशियों से भर गया। लेकिन अगली ही पल चिंता ने सर उठा लिया। गाय के आने के बाद होली दिन-रात मेहनत करने लगा। दूध बेचने लगा। खेत में और ज्यादा समय बिताने लगा। लेकिन किस्मत ने उसे चैन से जीने ना दिया। एक दिन गांव के दबंग ठाकुर की नजर उसकी गए पर पड़ी। ठाकुर ने कहा, हरी तुम्हारी जाति का आदमी गए पलता है। ये बात हजम नहीं होती। गाय को कुछ हो गया तो मत कहना हरी डर गया, लेकिन उसकी मजबूरी थी। जात-पात की दीवार इतनी ऊंची थी कि वह शकर भी कुछ नहीं कर सकता था। एक रात थोड़ी खेत से लौट रहा था। तब उसने देखा कि उसकी गए बेजान पड़ी है। किसी ने उसे जहर खिला दिया था। घर में कोहराम मच गया। हरी की आंखों से आंसू बहने लगे। मेरी चांदनी चली गई मेरा सपना टूट गया। गांव वाले तमाशा बिन बनकर देखते रहे। कोई भी मदद करने नहीं आया। अगले दिन लाल रामदयाल कार्स वसूल ने घर पहुंच गए। भी चली गई पैसा भी गया। अब क्या करोगे हरी धनिया ने अपने गहने उतार कर लाल के हाथ में रख दिए। ले जाओ। लाला पर अब और कुछ नहीं है। हमारे पास कर चुका तो दिया मगर घर में भूख चिंता। नाता रह गया समय बीत गया। हरी की मेहनत और ईमानदारी को गांव के एक बूढ़े किसान ने देखा जिसकी अपनी कोई संतान नहीं थी। उसने अपनी बुढ़ापे की गई होली को दान कर दी। एक बार फिर होली के आंगन में गाय की रामभाती आवाज से गूंज उठा। पर अब हरी के दिल में खुशी कम कसक ज्यादा थी। उसने अपनी सबसे प्यारी चीज परिवार की खुशियां अपने सेहत यहां तक की धनिया के गने तक को दिए थे। इस गाय के लिए आज भी गांव के लोग कहते हैं। होली के जैसा इंसान कोई नहीं उसने गाय के लिए सब कुछ खो दिया पर कभी ईमान नहीं बचा। हरी की कहानी साबित करती है की असली दौलत सपनों में नहीं अपनेपन और आत्मसम्मान में होती है।