महादेव का केदार आगमन by Storiyaa Editorial | Storiyaa
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महादेव का केदार आगमन
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by Storiyaa Editorial
▶Transcripción
यह कहानी है उसे पावन भूमि की जहां हिमालय की गोद में महादेव केदारेश्वर के रूप में विराजमान है। यह कथा है विश्वास, पश्चाताप और ईश्वर के अपने भक्तों के प्रति असीम प्रेम की केदारनाथ ज्योर्तिलिंग महादेव के पृष्ठ भाग के दिव्य कथा हिमालय की चोटियों पर जब सूर्य की पहली किरण पड़ती है तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति स्वयं महादेव का अभिषेक कर रही हो। लेकिन क्या आप जानते हैं कि महादेव इस निर्जन और दुर्गम स्थान पर कैसे आए। इसका उल्लेख महाभारत और स्कंद पुराण के केदारखंड में विस्तार से मिलता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद का सत्ता महाभारत का भीषण युद्ध समाप्त हो चुका था। पांडव विजय तो हुए थे लेकिन उनके मन में शांति नहीं थी। धर्मराज युधिष्ठिर के हृदय में एक गहरा घाव था। उन्होंने अपने ही गुरुओं पितामह और भाइयों का वध किया था। ऋषि व्यास ने उन्हें बताया कि उन पर गोत्र हत्या और ब्रह्म हत्या का पाप लगा है। इस पाप से मुक्ति का केवल एक ही मार्ग था। स्वयं महादेव के दर्शन और उनका आशीर्वाद पांडव अपना राज्यपाल त्याग कर द्रोपदी के साथ महादेव की खोज में हिमालय की ओर निकल पड़े। वह जानते थे कि महादेव ही उन्हें इस ग्लानि से मुक्त कर सकते हैं। महादेव की अंतर्ध्यान लीला जब महादेव को पता चला कि पांडव उनके दर्शन के लिए आ रहे हैं तो उन्होंने उनकी परीक्षा लेने का निर्णय लिया। शिव जानते थे कि पांडवों ने युद्ध धर्म के लिए लड़ा था लेकिन वो ये देखना चाहते थे कि उनके भीतर पश्चाताप की अग्नि कितनी तीव्र है। पांडव जब काशी पहुंचे तो शिव वहां से अंतर्ध्यान हो गए। वे जहां-जहां जाते शिव वहां से ओझल हो जाते। अंत में पांडव हिमालय की ऊंची घाटियों में केदार नामक स्थान पर पहुंचे। भगवान शिव ने यहां एक युक्ति अपनी उन्होंने स्वयं को एक वृषभ यानी बेल के रूप में परिवर्तित कर लिया और वहां चल रहे अन्य पशुओं के झुंड में मिल गए। भीम की चतुराई और महादेव का साक्षात पांडवों को। पास हो गया था कि महादेव यहीं कहीं छिपे हैं। भी ने अपना विशाल रूप धारण किया और दो पहाड़ियों पर अपने पैर फैलाकर खड़े हो गए। सभी गाय बैल भी के पैरों के नीचे से निकल गए। लेकिन एक बैल ने ऐसा करने से मना कर दिया। वो बेल कोई और नहीं स्वयं महादेव थे। जैसे ही भी ने उसे बैल को पकड़ने की कोशिश की बेल जमीन में समाने लगा भी ने फुर्ती दिखाते हुए बैल की पीठ का कूबड़ मजबूती से पकड़ लिया। पांडवों की सतुत भक्ति और दृढ़ निश्चय को देखकर महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए। दिव्य दर्शन और ज्योतिर्लिंग की स्थापना अचानक उसे स्थान पर एक दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में पांडवों के सामने प्रकट हुए। उन्होंने पांडवों को आशीर्वाद देते हुए कहा है। पांडवों, तुम्हारी भक्ति और धैर्य ने मुझे जीत लिया है। आज से तुम सभी पापों से मुक्त हो। मैं यहां सदा के लिए इसी रूप में निवास करूंगा। जिस स्थान पर भी ने बैल रूपी शिव की पीठ पड़ी थी वहां एक त्रिकोणीय शिवलिंग। बैठा हुआ इसी को आज हम केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में पूछते हैं। ये 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित है। पंच केदार का रहस्य पौराणिक तथ्यों के अनुसार जब शिव बेल के रूप में धरती में समय तो उनके शरीर के विभिन्न अंग पांच अलग-अलग स्थान पर प्रकट हुए, जिन्हें आज पंच केदार कहा जाता है। केदारनाथ जहां भगवान शिव का पृष्ठ भाग प्रकट हुआ मध्य महेश्वर जहां उनकी नाभि प्रकट हुई तुंगनाथ जहां उनकी भुजाएं यानी हाथ प्रकट हुए रुद्रनाथ जहां उनका मुख प्रकट हुआ कल्पेश्वर जहां उनकी जताए प्रकट हुई। इन पांचो स्थान के दर्शन के बिना केदारनाथ की यात्रा अधूरी मानी जाती है। आदि गुरु शंकराचार्य और मंदिर का पुनरुद्धार समय बीतता गया और द्वापर युग के बाद यह स्थान धीरे-धीरे लुप्त होने लगा। शास्त्रों के अनुसार आठवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने इस दिव्य मंदिर का पुनरुद्धार किया। उन्होंने ही केदारनाथ धाम को। धामू में से एक महत्वपूर्ण तीर्थ के रूप में स्थापित किया। कहा जाता है की मात्रा 32 वर्ष की आयु में शंकराचार्य जी ने इसी मंदिर के पीछे समाधि ली थी। मंदिर की वस्तु कला और चमत्कार केदारनाथ का मंदिर कत्यूरी शैली में बना है। इसके पत्थरों को जोड़ने के लिए किसी सीमेंट या कार्य का नहीं बल्कि इंटेल लॉकिंग तकनीक का प्रयोग किया गया है। 2013 की भीषण आपदा में जब सब कुछ बह गया था तब एक विशाल शीला भीम शिला ने मंदिर के पीछे जाकर उसकी रक्षा की थी। ये इस बात का जीवन प्रमाण है कि महादेव स्वयं अपने धाम की रक्षा करते हैं। आध्यात्मिक महत्व शास्त्र कहते हैं कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन करता है, उसे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। यहां की वायु में एक अलग ही स्पंदन है। बर्फ से ढकी चोटियां मंदाकिनी नदी का मधुर स्वर और हर हर महादेव के उद्घोष से यह स्थान साक्षात कैलाश का अनुभव करता है। केदारनाथ केवल एक मंदिर नहीं है। यह प्रतीक है उसे अटूट विश्वास का कि यदि? भक्ति के मन में सच्ची तड़प हो तो महादेव को स्वयं बेल बनकर भी दर्शन देने आना पड़ता है। आज भी जब कपाट खुल के हैं और ओम नमः शिवाय की गूंज हिमालय में गूंजती है तो भक्त को महसूस होता है कि महादेव वास्तव में वही विराजमान है अपने भक्तों की पुकार सुनने के लिए।