सैकड़ो जनों पहले की बात है जब वाराणसी नगरी में ब्रह्म दत्त नाम का एक शक्तिशाली। लेकिन अहंकारी राजा राज्य करता था। परंतु हमारी कहानी वाराणसी की नहीं बल्कि गंगा नदी के किनारे बसे एक विशाल और पवित्र हिमालय जंगल की है। वहां 80000 वानरों का एक समृद्ध कबीला रहता था। वे साधारण वानर नहीं थे और उनका राजा उनका राजा कोई और नहीं बल्कि स्वयं बोधी सत्व थे जिन्होंने वानर राज के रूप में जन्म लिया था। वानर राजमाह कापी विशाल और शक्तिशाली थे, लेकिन उनकी शक्ति से भी बड़ी थी। उनकी बुद्धिमत्ता और अपनी कबीले के प्रति उनकी करुणा विक राजा नहीं एक पिता के समान थे। कबीले का घर एक विशेष आम का पेड़ था। वह पेड़ साधारण नहीं था। वो दिव्या था उसकी फल इतनी मीठे और रसीले थे कि उनकी सुगंध दूर-दूर तक फैलती थी। वानर राज ने हमेशा अपने कबीले को चेतावनी दी थी। इस पेड़ के फलों को कभी नदी में मत गिरने देना। यदि वे नदी में गिरकर इंसानों के राज्य में पहुंच गए तो यह। हमारे कबीले के विनाश का कारण बनेगा लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। तमाम सावधानियां के बावजूद एक परिपक्व आम नदी में गिर गया। वो पवित्र फल गंगा की लहरों पर बहता हुआ वाराणसी के शाही घाट पर पहुंच गया। राजा ब्रह्मदत नदी में स्नान कर रहे थे। जब उन्हें वो दिव्या सुगंधाई, उन्होंने व फल देखा और मंगवाया जैसे ही उन्होंने पहले टुकड़ा चखा। उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। वो स्वाद अकल्पनीय था। राजा पागल हो उठे, मुझे ये फल चाहिए। मुझे इस फल का पूरा पेड़ चाहिए। उन्होंने गर्जना की राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को बुलाया। उन्होंने सी को गंगा के किनारे उसे पेड़ के स्रोत को खोजने का आदेश किया। सैनिकों ने महीना तक खोज की। वह पहाड़ों और जंगलों में घुसे और अंतत उन्होंने वो दिव्या आम का पेड़ का लिया और उसे पर बैठे ₹80000 वानरों को भी सुना ने पेड़ को चारों ओर से घेर लिया। रात हो चुकी थी। सैनिकों के हाथों में जलती हुई मसाले दी। धनुषों पर जहरीले बढ़ चढ़े हुए थे राजा। आदेश स्पष्ट था। सारे वानरों को मार डालो। सुबह होते ही एक भी वानर जीवित नहीं बचना चाहिए। वानर कबीले में दहशत फैल गई। बच्चे रोने लगे। माताएं अपने बच्चों को सीने से लगाकर कांपने लगी वेचनों ओर से घिर चुके थे। मौत उनके बहुत करीब थी देवनार राजमा कभी के पास भेज महाराज हमें बचाए इंसान हमें मार डालेंगे। मा कभी शांत थे। उन्होंने कभी देखी दहशत अच्छी उनका दिल भर आया। उन्होंने अपने कबीले की ओर देखा और कहा डरो मत मेरे बच्चों मैं तुम्हें बचाऊंगा। मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा। गंगा नदी गहरी और तेज थी। दूसरी तरफ एक सुरक्षित था, लेकिन वहां तक पहुंचाने का कोई रास्ता नहीं था। वहां कभी एक लंबी बेल के पास भेज। उन्होंने उसे बेल के एक सिरे को एक पेड़ से कस कर बंधा। फिर भी नदी के किनारे थक गए और अपनी पूरी ताकत लगाकर एक अकल्पनीय चलांग लगे। लेकिन बिल थोड़ी छोटी पड़ गई। फिर दूसरी तरफ के पेड़ तक नहीं पहुंच पाए, लेकिन वे पीछे नहीं मुद्दे उन्होंने दूसरी तरफ की एक मजबूत पेड़ की शाखा को अपने हाथों से पकड़ लिया। अब उनकी अपनी दे उनकी अपनी दे उसे बल और सुरक्षित तक के बीच का आखिरी सीरप्प। थी। उनकी मांसपेशियां खिंच रही थी। उनका शरीर फट रहा था, परंतु वे डटे रहे। उन्होंने चिल्ला कर अपने कबीले से कहा, भागो जल्दी भागो मेरी डे पर पैर रखकर सुरक्षित तट पर पहुंचाओ। मैं तब तक नहीं रुकूंगा। जब तक तुम सब सुरक्षित ना हो जाओ। ₹80000 वानर विभाग ने लगे एक-एक करके विवाह कभी की डे पर पैर रखकर नदी पार करने लगे। प्रत्येक वानर के पैर का दबाव महाकवि को असहनीय पीड़ा दे रहा था। उनका शरीर टूट रहा था लेकिन उनका संकल्प नहीं वे सहते रहे। एक घंटा दो घंटे 3 घंटे। लेकिन वानर ओके कबीले में एक वानर महाकवि का ही भाई देवटत जॉन से चला था। वह अभी भी पेड़ पर था। जैसे ही देवदत्त ने महाकवि की डे पर पर रखा। उसने एक भय रखम किया। उसने अपनी पूरी ताकत से महाकवि की पीठ पर हमला किया। कड़क देव दत्त की ईर्ष्या ने महाकवि की रीड की हड्डी तोड़ दी थी। लेकिन बोधी सत्व ने अपना हाथ नहीं छोड़ा। वह जानते थे कि अगर बिहार मान लेंगे तो उनके बच्चे मारे जाएंगे। वे असहनीय पीड़ा में भी सुरक्षित को पड़े रहे। सुबह होने तक आखिरी वानर भी सुरक्षित तक पर पहुंच गया था महाकवि ने। कैट हिल कर दी और नीचे गिर पड़े राजा ब्रह्म दत्त ने यह पूरा दृश्य देखा था। वो स्तब्ध था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि एक राजा अपने टच कभीले के लिए अपनी जान दांव पर लगा सकता है। वो वानर के पास गया और सैनिकों को आदेश दिया। इन्हें नीचे उतरो। इनका ध्यान रखो। ये कोई साधारण वानर नहीं है। राजा ब्रह्मदत्त ने महाकवि को जमीन पर लेताया और उनके सर को अपनी गोद में रख लिया और रोने लगा। महा कभी राजा ने पूछा, तुमने ऐसा क्यों किया तुम एक राजा थे, तुम भाग सकते थे। तुमने अपने शरीर को पल क्यों बनाया? महाकवि ने अपनी आंखें खोली। उनकी आवाज एक पुष्प हार थी, लेकिन उसमें एक दिव्या शांति दी थी। उन्होंने राजा ब्रह्म दत्त की ओर देखा और कहा है राजन मैं उनके लिए राजा नहीं उनके पिता था। एक राजा एक राजा वो नहीं है जो अपने कबीले पर राज करता है। एक सच्चा राजा वो है जो अपने कबीले के लिए अपना सब कुछ अपना शरीर अपनी आत्मा अपना बलिदान कर सकता है। जब तक मेरा कबीला सुरक्षित है। मेरी मृत्यु का कोई दुख नहीं है। ये कहते हुए महाकवि ने अपनी आखिरी सांस ली। राजा ब्रा मदद देने उसे दिन एक महान सबक सीखा उन्होंने। अपने घमंड को तैयार दिया और एक धार्मिक न्याय प्रिय और करुणा पूर्ण राजा बन गए। वानर राज का बलिदान पंचतंत्र और जातक कथाओं में हमेशा के लिए अमर हो गया जो हमें सिखाता है कि सर्वोच्च नेतृत्व केवल सेवा है।
सैकड़ो जनों पहले की बात है जब वाराणसी नगरी में ब्रह्म दत्त नाम का एक शक्तिशाली। लेकिन अहंकारी राजा राज्य करता था। परंतु हमारी कहानी वाराणसी की नहीं बल्कि गंगा नदी के किनारे बसे एक विशाल और पवित्र हिमालय जंगल की है। वहां 80000 वानरों का एक समृद्ध कबीला रहता था। वे साधारण वानर नहीं थे और उनका राजा उनका राजा कोई और नहीं बल्कि स्वयं बोधी सत्व थे जिन्होंने वानर राज के रूप में जन्म लिया था। वानर राजमाह कापी विशाल और शक्तिशाली थे, लेकिन उनकी शक्ति से भी बड़ी थी। उनकी बुद्धिमत्ता और अपनी कबीले के प्रति उनकी करुणा विक राजा नहीं एक पिता के समान थे। कबीले का घर एक विशेष आम का पेड़ था। वह पेड़ साधारण नहीं था। वो दिव्या था उसकी फल इतनी मीठे और रसीले थे कि उनकी सुगंध दूर-दूर तक फैलती थी। वानर राज ने हमेशा अपने कबीले को चेतावनी दी थी। इस पेड़ के फलों को कभी नदी में मत गिरने देना। यदि वे नदी में गिरकर इंसानों के राज्य में पहुंच गए तो यह। हमारे कबीले के विनाश का कारण बनेगा लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। तमाम सावधानियां के बावजूद एक परिपक्व आम नदी में गिर गया। वो पवित्र फल गंगा की लहरों पर बहता हुआ वाराणसी के शाही घाट पर पहुंच गया। राजा ब्रह्मदत नदी में स्नान कर रहे थे। जब उन्हें वो दिव्या सुगंधाई, उन्होंने व फल देखा और मंगवाया जैसे ही उन्होंने पहले टुकड़ा चखा। उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। वो स्वाद अकल्पनीय था। राजा पागल हो उठे, मुझे ये फल चाहिए। मुझे इस फल का पूरा पेड़ चाहिए। उन्होंने गर्जना की राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को बुलाया। उन्होंने सी को गंगा के किनारे उसे पेड़ के स्रोत को खोजने का आदेश किया। सैनिकों ने महीना तक खोज की। वह पहाड़ों और जंगलों में घुसे और अंतत उन्होंने वो दिव्या आम का पेड़ का लिया और उसे पर बैठे ₹80000 वानरों को भी सुना ने पेड़ को चारों ओर से घेर लिया। रात हो चुकी थी। सैनिकों के हाथों में जलती हुई मसाले दी। धनुषों पर जहरीले बढ़ चढ़े हुए थे राजा। आदेश स्पष्ट था। सारे वानरों को मार डालो। सुबह होते ही एक भी वानर जीवित नहीं बचना चाहिए। वानर कबीले में दहशत फैल गई। बच्चे रोने लगे। माताएं अपने बच्चों को सीने से लगाकर कांपने लगी वेचनों ओर से घिर चुके थे। मौत उनके बहुत करीब थी देवनार राजमा कभी के पास भेज महाराज हमें बचाए इंसान हमें मार डालेंगे। मा कभी शांत थे। उन्होंने कभी देखी दहशत अच्छी उनका दिल भर आया। उन्होंने अपने कबीले की ओर देखा और कहा डरो मत मेरे बच्चों मैं तुम्हें बचाऊंगा। मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा। गंगा नदी गहरी और तेज थी। दूसरी तरफ एक सुरक्षित था, लेकिन वहां तक पहुंचाने का कोई रास्ता नहीं था। वहां कभी एक लंबी बेल के पास भेज। उन्होंने उसे बेल के एक सिरे को एक पेड़ से कस कर बंधा। फिर भी नदी के किनारे थक गए और अपनी पूरी ताकत लगाकर एक अकल्पनीय चलांग लगे। लेकिन बिल थोड़ी छोटी पड़ गई। फिर दूसरी तरफ के पेड़ तक नहीं पहुंच पाए, लेकिन वे पीछे नहीं मुद्दे उन्होंने दूसरी तरफ की एक मजबूत पेड़ की शाखा को अपने हाथों से पकड़ लिया। अब उनकी अपनी दे उनकी अपनी दे उसे बल और सुरक्षित तक के बीच का आखिरी सीरप्प। थी। उनकी मांसपेशियां खिंच रही थी। उनका शरीर फट रहा था, परंतु वे डटे रहे। उन्होंने चिल्ला कर अपने कबीले से कहा, भागो जल्दी भागो मेरी डे पर पैर रखकर सुरक्षित तट पर पहुंचाओ। मैं तब तक नहीं रुकूंगा। जब तक तुम सब सुरक्षित ना हो जाओ। ₹80000 वानर विभाग ने लगे एक-एक करके विवाह कभी की डे पर पैर रखकर नदी पार करने लगे। प्रत्येक वानर के पैर का दबाव महाकवि को असहनीय पीड़ा दे रहा था। उनका शरीर टूट रहा था लेकिन उनका संकल्प नहीं वे सहते रहे। एक घंटा दो घंटे 3 घंटे। लेकिन वानर ओके कबीले में एक वानर महाकवि का ही भाई देवटत जॉन से चला था। वह अभी भी पेड़ पर था। जैसे ही देवदत्त ने महाकवि की डे पर पर रखा। उसने एक भय रखम किया। उसने अपनी पूरी ताकत से महाकवि की पीठ पर हमला किया। कड़क देव दत्त की ईर्ष्या ने महाकवि की रीड की हड्डी तोड़ दी थी। लेकिन बोधी सत्व ने अपना हाथ नहीं छोड़ा। वह जानते थे कि अगर बिहार मान लेंगे तो उनके बच्चे मारे जाएंगे। वे असहनीय पीड़ा में भी सुरक्षित को पड़े रहे। सुबह होने तक आखिरी वानर भी सुरक्षित तक पर पहुंच गया था महाकवि ने। कैट हिल कर दी और नीचे गिर पड़े राजा ब्रह्म दत्त ने यह पूरा दृश्य देखा था। वो स्तब्ध था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि एक राजा अपने टच कभीले के लिए अपनी जान दांव पर लगा सकता है। वो वानर के पास गया और सैनिकों को आदेश दिया। इन्हें नीचे उतरो। इनका ध्यान रखो। ये कोई साधारण वानर नहीं है। राजा ब्रह्मदत्त ने महाकवि को जमीन पर लेताया और उनके सर को अपनी गोद में रख लिया और रोने लगा। महा कभी राजा ने पूछा, तुमने ऐसा क्यों किया तुम एक राजा थे, तुम भाग सकते थे। तुमने अपने शरीर को पल क्यों बनाया? महाकवि ने अपनी आंखें खोली। उनकी आवाज एक पुष्प हार थी, लेकिन उसमें एक दिव्या शांति दी थी। उन्होंने राजा ब्रह्म दत्त की ओर देखा और कहा है राजन मैं उनके लिए राजा नहीं उनके पिता था। एक राजा एक राजा वो नहीं है जो अपने कबीले पर राज करता है। एक सच्चा राजा वो है जो अपने कबीले के लिए अपना सब कुछ अपना शरीर अपनी आत्मा अपना बलिदान कर सकता है। जब तक मेरा कबीला सुरक्षित है। मेरी मृत्यु का कोई दुख नहीं है। ये कहते हुए महाकवि ने अपनी आखिरी सांस ली। राजा ब्रा मदद देने उसे दिन एक महान सबक सीखा उन्होंने। अपने घमंड को तैयार दिया और एक धार्मिक न्याय प्रिय और करुणा पूर्ण राजा बन गए। वानर राज का बलिदान पंचतंत्र और जातक कथाओं में हमेशा के लिए अमर हो गया जो हमें सिखाता है कि सर्वोच्च नेतृत्व केवल सेवा है।