▶Story Transcript
एक समय की बात है, एक शांत सरोवर के किनारे एक बूढ़ा बगुला रहता था। सरोवर में रंग-बिरंगी मछलियों, मेढ़कों और जलचरों की भरमार थी। बगुला दिनभर अपने लंबे पैरों पर खड़ा रहता और जैसे ही कोई मछली पास आती, उसे झपट लेता।
समय बीतता गया और बगुला बूढ़ा हो चला। अब उसका शरीर पहले जैसा फुर्तीला नहीं रहा। उसकी चोंच कमजोर हो गई थी और आंखों की रोशनी भी कम होने लगी थी। शिकार करना उसके लिए कठिन हो गया था। भूख से बेचैन, वह सरोवर के किनारे उदास बैठा सोचने लगा—"अब पेट कैसे भरूं?"
उसी समय उसकी नजर मछलियों के झुंड पर पड़ी। उसके मन में एक योजना आई। उसने अपना सिर झुका लिया, और गहरी सांस लेकर आंसू बहाने लगा।
कुछ मछलियों ने बगुले को रोते देखा। वे हैरान होकर उसके पास पहुंचीं। एक बड़ी मछली ने पूछा, "बगुले मामा, आप क्यों रो रहे हैं?"
बगुला कराहते हुए बोला, "बच्चो, मुझे तुम्हारी बहुत चिंता हो रही है।"
मछलियों ने चौंककर पूछा, "क्या हुआ? आप क्यों परेशान हैं?"
बगुला बोला, "कल मैंने कुछ मछुआरों की बात सुनी। वे इसी सरोवर को जालों से सूना करने वाले हैं। यदि ऐसा हुआ तो तुम सब मारी जाओगी। मुझे तो बूढ़ा होने के कारण कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर तुम सब कैसे बचोगी?"
मछलियों में हड़कंप मच गया। वे बोलीं, "मामा, हम क्या करें? हमें रास्ता बताइए।"
बगुला गहरी सांस लेकर बोला, "पास ही एक दूसरा बड़ा और गहरा सरोवर है, जहां मछुआरे कभी नहीं आते। अगर तुम चाहो तो मैं एक-एक करके अपनी पीठ पर बैठाकर वहां पहुंचा सकता हूँ।"
मछलियां डरी हुई थीं। वे आपस में फुसफुसाने लगीं। आख़िरकार, उन्होंने बगुले पर भरोसा कर ही लिया। बगुला रोज़ एक-दो मछलियों को अपनी चोंच में दबाकर उड़ता और उन्हें दूसरे सरोवर पहुँचाने का वादा करता।
कुछ दिन बीते। लेकिन असलियत यह थी कि बगुला मछलियों को सरोवर की बजाय पास के एक बड़े पत्थर पर ले जाकर खा जाता और हड्डियाँ वहीं फेंक देता। धीरे-धीरे सरोवर की मछलियों की संख्या घटने लगी, लेकिन बाकी मछलियों को कुछ समझ में नहीं आया।
सरल और समझदार केकड़ा भी उस सरोवर में रहता था। उसे कुछ संदेह हुआ। उसने मछलियों की कमी पर गौर किया और बगुले से पूछा, "मामा, बहुत सी मछलियां गईं, फिर भी कोई वापस नहीं आई। क्या मैं भी आपके साथ नए सरोवर जा सकता हूँ?"
बगुला अपनी चाल में सफल होता देख बहुत खुश हुआ। उसे लगा कि केकड़े जैसे नरम जीव को खाना तो और भी आसान होगा। वह बोला, "बिल्कुल, आओ मेरे साथ। मैं तुम्हें भी नई जगह पहुंचा दूंगा।"
केकड़ा सतर्क था। वह बगुले की पीठ पर नहीं चढ़ा, बल्कि अपनी मजबूत पकड़ से बगुले की गर्दन को जकड़ लिया। बगुला उड़ चला। जैसे ही वह पत्थर के पास पहुँचा, केकड़े ने चारों ओर हड्डियों का ढेर देखा और सारी सच्चाई समझ गया।
बगुला जैसे ही केकड़े को पत्थर पर पटकने वाला था, केकड़े ने अपनी मजबूत कैंचियों से बगुले की गर्दन को जोर से दबाया। बगुला छटपटाने लगा, पर केकड़े ने उसकी गर्दन तब तक नहीं छोड़ी, जब तक उसकी जान न निकल गई।
केकड़ा सरोवर में लौटा और सबको बगुले की सच्चाई बता दी। बाकी बची मछलियां और सभी जीव बहुत खुश हुए।
केकड़े की सूझ-बूझ और साहस ने सबकी जान बचाई। तभी से सब मानने लगे—
"दुष्ट की बातों पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए। विवेक और साहस से ही संकटों से बचा जा सकता है।"