यह कहानी उस समय की है जब नमक पर भारी सरकारी कर लगा दिया गया था और इसकी तस्करी कम बात ही एक थी। इसी में एक स्वाभिमानी और ईमानदार नौजवान, रामेश्वर प्रसाद, सरकारी नौकरी में 'नमक का दरोगा' नियुक्त होते। इस समय यह पद बहुत ताकतवर माना जाता था क्योंकि इसमें रिश्वत की अपार संभावनाएं थीं। लोग इसे 'ऊपरी आमाद' का बेहतरीन करियां मानते थे, लेकिन रामेश्वर के अंदर अपने ईमानदारी साबित करने की जक्क थी।
यह कहानी उस समय की है जब नमक पर भारी सरकारी कर लगा दिया गया था और इसकी तस्करी कम बात ही एक थी। इसी में एक स्वाभिमानी और ईमानदार नौजवान, रामेश्वर प्रसाद, सरकारी नौकरी में 'नमक का दरोगा' नियुक्त होते। इस समय यह पद बहुत ताकतवर माना जाता था क्योंकि इसमें रिश्वत की अपार संभावनाएं थीं। लोग इसे 'ऊपरी आमाद' का बेहतरीन करियां मानते थे, लेकिन रामेश्वर के अंदर अपने ईमानदारी साबित करने की जक्क थी।