धैर्यवान भैंस और शरारती बंदर की कहानी
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धैर्यवान भैंस और शरारती बंदर की कहानी

इस पौराणिक पंचतंत्र कथा में एक धैर्यवान भैंस को एक शरारती बंदर बार-बार सताता है, पर भैंस अपनी सहनशीलता से सबक सिखाती है। जानिए धैर्य और सहनशीलता का मह...

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by Storiyaa Editorial

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बहुत समय पहले की बात है। एक घना जंगल था, जिसमें तरह-तरह के जानवर रहते थे। उसी जंगल में एक बड़ा, मजबूत और शांत स्वभाव का भैंस रहता था। उसका नाम था भैरव। भैरव बहुत ही धैर्यवान और सहनशील था। जंगल के सभी जानवर उसकी विनम्रता और शांत स्वभाव की तारीफ करते थे। वह घास चरता, पेड़ों की छांव में आराम करता और किसी से भी कभी झगड़ा नहीं करता था। इसी जंगल में एक शरारती बंदर भी रहता था। उसका नाम था मंटू। मंटू को दूसरों को परेशान करने में मजा आता था। वह कभी किसी की पूंछ खींचता, तो कभी किसी के खाने में छेड़छाड़ करता। लेकिन सबसे ज्यादा उसे भैंस भैरव को सताने में मजा आता था, क्योंकि भैरव कभी गुस्सा नहीं करता था। एक दिन दोपहर के समय, भैरव एक बड़े पेड़ के नीचे बैठा था और आराम से अपनी आंखें बंद किए आराम कर रहा था। तभी मंटू बंदर वहां पहुंच गया। उसने भैरव की पूंछ पकड़कर खींची, कभी उसकी पीठ पर उछल-कूद की, तो कभी उसकी सींग के पास आकर चिढ़ाने लगा। भैरव ने आंखें खोलीं, लेकिन शांत रहकर कुछ नहीं कहा। मंटू ने सोचा, "ये भैंस तो बहुत ही आलसी और डरपोक है। इसे थोड़ा और परेशान करना चाहिए।" मंटू ने अब भैरव के कान के पास जाकर तेज-तेज आवाजें निकालनी शुरू कर दीं। कभी-कभी तो वह भैरव के चेहरे के सामने आकर मजाकिया मुंह बनाता, तो कभी उससे उलटे-पुलटे सवाल पूछता। भैरव बस चुपचाप देखता रहा। वह जानता था कि झगड़े और गुस्से से कोई फायदा नहीं, इसलिए वह धैर्य रखे रहा। कुछ देर बाद पास के झरने पर हिरणों का झुंड पानी पीने आया। मंटू फौरन उनके पास पहुंचा और बोला, "देखो, देखो! ये भैंस कितना मूर्ख है। मैं इसे कितना सताता हूँ, फिर भी ये कुछ नहीं करता। क्या इसे गुस्सा ही नहीं आता?" हिरणों ने भैरव से पूछा, "भैरव, तुम मंटू को मना क्यों नहीं करते? ये तो तुम्हें रोज तंग करता है!" भैरव ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "मित्रों, अगर मैं मंटू पर गुस्सा करूं, तो मेरे और उसके बीच झगड़ा बढ़ जाएगा। मेरा शांत रहना ही सही है। जब कोई हमें तंग करता है, तो हम चाहें तो धैर्य से काम लेकर समस्या को टाल सकते हैं।" मंटू ने भैरव की बात सुनी, लेकिन उसकी शरारतें कम नहीं हुईं। अगले कुछ दिनों तक वह रोज भैरव को नए-नए तरीकों से तंग करता रहा। कभी उसकी पीठ पर बैठ जाता, कभी उसके सिर पर पत्ते गिराता। लेकिन भैरव ने कभी उससे बदला नहीं लिया। एक दिन जंगल में शेर आ गया। शेर बहुत भूखा था और शिकार की तलाश में था। सभी जानवर डर के मारे इधर-उधर भागने लगे। मंटू घबरा गया, क्योंकि वह पेड़ पर चढ़ नहीं पा रहा था। वह डर के मारे भैरव के पास भागा और बोला, "भैरव! मुझे बचा लो! शेर मुझे खा जाएगा!" भैरव ने मंटू को अपने सींगों के बीच छुपा लिया और शेर के गुजरने तक उसे सुरक्षित रखा। जब शेर वहां से चला गया, तब मंटू ने राहत की सांस ली। मंटू की आंखें भर आईं। उसने भैरव से कहा, "भैरव, मैंने तुम्हें बहुत तंग किया, फिर भी तुमने मेरी मदद की। मैं शर्मिंदा हूँ। अब से मैं कभी किसी को परेशान नहीं करूंगा।" भैरव मुस्कुराया और बोला, "मंटू, जो दूसरों के साथ बुरा करता है, उसे कभी न कभी अपनी गलती का अहसास जरूर होता है। हमें हमेशा धैर्य और सहनशीलता से काम लेना चाहिए।" उस दिन के बाद मंटू ने किसी को परेशान नहीं किया और वह और भैरव अच्छे मित्र बन गए। जंगल के सभी जानवरों ने भी भैरव जैसी सहनशीलता और धैर्य को अपनाया। कहानी से सीख: धैर्य और सहनशीलता हमेशा लाभकारी होते हैं। बुरे व्यवहार का उत्तर गुस्स

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